“अर्थ जो मैंने जाना”

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डॉ. निर्मला सिंह
महात्मा गांधी का नाम मोहनदास करमचंद गांधी था व उनकी माता का नाम पुतलीबाई था और उनका जन्म पोरबंदर में हुआ था । छोटी कक्षाओं के निबंध और भाषण में हम बार-बार इन वाक्यों को रटते रहे हैं । यदि माहौल ना मिल पाए तो सामान्य व्यक्ति इससे अधिक कुछ नहीं जान पाता था ।
आज संचार के साधनों और तकनीकी विकास के साथ इन मामलों और जानकारियों में बहुत कुछ वृद्धि हुई है । सन 1982 जब मैं बापू के कस्तूरबाग्राम में पहुँची तब बापू के बारे में मेरा ज्ञान भी सीमित ही था । कस्तूरबा बापू की पत्नी थी इससे ज्यादा मैं “बा” के बारे में नहीं जानती थी।
अब 36 साल के बा-बापू के इस परिसर में कार्य काल से, मैं अपने सुख के अनुभव के साथ कह सकती हूं कि मैंने बा और बापू को कुछ सीमा तक जाना है । मेरा यह दावा नहीं है कि मैंने कितना गांधी साहित्य पढ़ा है। एक शिक्षक के नाते मैं जानती हूं ,कि पढ़ने और ग्रहण करने में बड़ा अंतर है । गांधी साहित्य का भंडार रखने वाला व्यक्ति यदि प्रतिदिन लोगों को मानसिक प्रताड़ना दे तो पहले उस साहित्य के भंडार पर ताला लगाना बेहतर होगा ।
गांधी जी को सिर्फ पढ़ने या उनके बारे में मात्र जानने के स्थान पर जो पढ़ा सुना या जाना है उसका यदि हम 10% भी व्यवहार में लाकर स्थाई कर ले ,तो समाज हित में यह हमारा बड़ा योगदान होगा ।
यह सत्य है ,कि इस युग में कोई गांधी नहीं बन सकता है और ना ही मात्र खादी पहनने से गांधीवाद आ सकता है । नारे लगाकर और कार्यक्रमों के आयोजनों से हम गांधी विचार का प्रचार अवश्य कर सकते हैं, किंतु गांधी विचार का वातावरण बनाने के लिए सबसे पहले हमें स्वयं का आकलन करना चाहिए , स्वयं से कुछ प्रश्न करना चाहिए । ऐसा मेरा व्यक्तिगत विचार है |
बापू के अनुसार शिक्षित होने का अर्थ मात्र डिग्रियां हासिल करना नहीं है । अंग्रेजी झाड़ने वाला हिंदुस्तानी विद्वान है, यह भी नहीं कहा जा सकता । अपने सीमित ज्ञान का उपयोग यदि व्यक्ति परोपकार में करता है ,तो वह उन  विद्वानों से श्रेष्ठ है, जो अपनी विद्वता का उपयोग प्रभुत्व जमाने के लिए करते हैं ।
कम शिक्षित अशिक्षित व्यक्ति यदि भय मुक्त है और अपनी रचनात्मक प्रवृत्तियों का उपयोग स्वयं के साथ-साथ दूसरों के लिए भी करता है ,तो ऐसा व्यक्ति उन लोगों से श्रेष्ठ है जो अपनी विद्वता का सिर्फ ढोल पीटते हैं | विरोध डिग्रियों को हासिल करने से नहीं है । मुद्दा यह है ,कि जो हमारी डिग्रियां और उपलब्धियां हैं, हमें उसकी तुलना में और अधिक साथ ही बेहतर कार्य करना चाहिए तभी शिक्षा की सार्थकता है ।

हमारे कार्य और व्यवहार ऐसे होने चाहिए कि हमारे सच्चे साथियों की संगत और संख्या बढ़ती जाए । आजकल आदेशों और शपथ का चलन बढ़ गया है । आदेशों की आवश्यकता तभी बढ़ती है जब स्वयं मुखिया पथ प्रदर्शक नहीं होता |
बापू  का मानना था कि किसी भी स्थिति को पहले जानो, समझो और फिर स्वयं करो । इसके बाद किसी से मनवाने या करवाने के लिए किसी विशेष प्रयत्न (आदेश) की आवश्यकता नहीं होगी , क्योंकि मुखिया स्वयं अनकहा पथ प्रदर्शक हो जाता है । कई समस्याओं का समाधान इस प्रकार  किया जा सकता है । कथनी और करनी में हमेशा एकता होनी चाहिए । इनकी एकता से हमें संतुष्टि मिलती है और कभी आत्मग्लानि नहीं होती । वैसे सरल सच्चे और निष्ठावान व्यक्ति की ग्लानि के अर्थ को समझ पाते हैं ।
समय की पाबंदी स्वयं की हो तो, ना तो कोई कार्य अधूरा रहेगा और ना ही समय का अभाव होगा | हमें एक समय में एक से अधिक कार्य करने की आदत होना चाहिए । बात अटपटी लग सकती है, किंतु ऐसा करने में बड़ा आनंद आता है, क्योंकि हम अपने समय का अधिकतम उपयोग कर लेते हैं । इससे हमें संतोष मिलता है ।
जब व्यक्ति अफसरशाही का भ्रम पाल लेता है, तो ना तो खुद सुखी रह पाता है और ना ही अपने सहकर्मियों को सुखी रह कर संतोष पूर्वक कार्य करने देता है । सद्भाव और निष्ठा से जब जिम्मेदारी निभाई जाती है ,तो सब में अनुशासन स्वयं ही बन जाता है | किसी अधिकारी को अपने पद का हवाला देने की आवश्यकता नहीं होती । बड़े अधिकारी में जिम्मेदार साथीपन की भावना होना जरूरी है ।
सत्य बोलने के लिए सच्चे मन और साहस की आवश्यकता होती है । यह साहस भी तभी हो सकता है जब हम सत्य पर अमल करते हो। सत्य बोलना हमें भय से मुक्त भी करता है इससे निश्चितता भी आती है । इससे हमारे अच्छा सोचने और समझने की क्षमता बढ़ती है । यह ऐसा प्रयास है, जिसमें हमारा कोई धन तो व्यय नहीं होता है किंतु मानसिक समृद्धि प्राप्त होती है | ईश्वर ने हमें प्रतिभाओं से संपन्न मस्तिष्क दिया है | हमें अपने मस्तिष्क और प्रतिभाओं (क्षमता और योग्यता) का भरपूर उपयोग करना चाहिए । उपयोग करने से इनमें वृद्धि ही होती है । दूसरों की उंगली पकड़कर चलने की एक निश्चित अवस्था होती है । इसके बाद भी यदि यह मनोवृति बनी रहे तो यह ईश्वर की कृति का अपमान होगा । जितना सोच सकते हैं अच्छा सोचें जितना कर सकते हैं, अच्छा ही करें | यह हमारा स्वभाव होना चाहिए |
स्वभाव व्यक्तिगत होता है । किसी वातावरण का उस पर प्रभाव तो हो सकता है ,किंतु पारिवारिक संस्कार और आदतें स्वभाव को मजबूत बनाते हैं ।
स्वमूल्यांकन करते हुए यदि हम बा-बापू के विचारों से स्वयं को तोले और खामियों को सुधारने की कोशिश करें तो 150वी जन्म शताब्दी पर यह उन्हें सच्चा नमन होगा . सत्य है कि- “हम सुधरेंगे जग सुधरेगा |”