कांग्रेस :महाभियोग से महावियोग तक …

0
74

Edited by- Navneet Gupta

– श्रीगोपाल गुप्ता –

अंततः कांग्रेस सहित सात विपक्षी सांसदों द्वारा देश के माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस राज्यसभा के सभापति एवं देश के उपराष्ट्रपति श्री वैंकया नायडू ने सोमवार को यह कहते हुये खारिज कर दिया कि इसमें मुख्य न्यायाधीश के कदाचार के समर्थन में कोई सबूत नहीं है और यह प्रस्ताव राजनीतिक है! जैसा की पहले से ही अपेक्षित था कि महाभियोग की भ्रूण अवस्था में ही मृत्यु हो जायेगी! अब कांग्रेस जहां इसे भ्रूण हत्या मान रही है वहीं सत्तारुण भाजपा इसे संबेधानिक व प्राकृतिक मौत साबित निरूपित कर रही है! भाजपा और माननीय उपराष्ट्रपति कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप चस्पा कर रहे हैं! फिलाहल कांग्रेस इस मुद्दे पर उसी सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेगी जिसके मुखिया के खिलाफ वो कदाचार के आरोप लगा रही है! ये भी अपने आपमें देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्य न्यायाधीश इस याचिका पर क्या फैसला लेते हैं? यह तो तय है कि वे स्वयं इस पर सुनवाई नहीं करेंगे क्योंकि मामला उनसे ही संबंधित है !मगर यह तय करना उनके ही अधिकार क्षेत्र में है कि मामले को अपने बाद किस सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को स्थानांतरण करे या फिर न्यायपीठ की एक संविधानिक बैंच का गठन कर उसके सुपुर्द करें? मगर हर हाल में सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही मुखिया के खिलाफ करनी है! बहरहाल उचित तो यह होता कि सदन में बिना बहुमत के कांग्रेस और सात दलों के विपक्षी 64 सांसदों को मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ यह महाभियोग लाना ही नहीं चाहिए था, मगर जब विधि सम्मत ले भी आये तो देश के माननीय उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति जी को भी विधि सम्मत तरीके से इस पर अपना फैसला सुनाना चाहिए! उपराष्ट्रपति जी का यह कहना कि मेने घंटों विद्वान अभिभाषकों व संविधानिक हस्तियों से विचार विमर्श कर ये निर्णय लिया है, सर्वदा उचित हो सकता है?मगर ध्यान में ये भी रखा जाना चाहिए था कि प्रस्ताव तैयार करने वाले भी उसी सर्वोच्च न्यायालय के ज्येष्ठ और चोटी के कानूनविद् हैं ,फिर चूक कहां हुई?

माननीय उपराष्ट्रपति जी और भाजपा का यह कहना बिल्कुल उचित है कि कांग्रेस इस पर राजनीति कर रही है!देश के विभिन्न राज्यों से राज्यसभा में आने वाले ये 64 सांसद आखिर राजनितिक ही तो हैं ,तो उनका राजनीति करना स्वाभाविक है!देखना यह है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लाये महाभियोग प्रस्ताव पर वे राजनीति देशहित और न्यायापालिका के हित में कर रहे हैं या खुद की पार्टी के हित में कर रहे हैं! राजनीति तो सत्तारुण भाजपा भी कर रही है, क्या इसमें किसी को शक है?कांग्रेस जहां अपनी ढपली बजा रही है तो भाजपा राग भैरवी का गायन कर रही है,राजनीति दोनों कर रहे हैं! देश हित में चिंतन कोन कितना कर रहा है? ये पूरा देश देख रहा है! दशकों से देश को ससुरी मंहगाई डायन खात रही और आज पेट्रोल, डीजल सहित सभी जरुरी जरुरी जिंसो के दाम आसमान पर हैं मगर किसी दल को ये दिखाई नहीं दे रहा है! वो चुनाव आयोग जो बात-बात पर घुड़की देता था, अब खुद से पहले कर्नाटक चुनाव की तारीख एक सत्तारुण पार्टी के नेताजी द्वारा कर देने के बावजूद चुप है!मनमोहन सरकार को हिला देने वाले “कैग “किस कोने में हैं, किसी को अता-पता नहीं है! निरन्तर दिल हिला देने वाले मामलों में आरोपियों को निर्दोष करार देने वाली कोई अदालत शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों से यह पूछने की जरुरत महसूस नहीं कर रही हैं कि यदि ये दोषी नहीं है, तो फिर दोषी कोन है?देश की संविधानिक संस्थाओं का जो बुरा हष्र हो रहा है, वो चिंता का विषय है! माननीय सभापति जी को चाहिए था कि वे नोटिस पर संविधान अनुसार एक कमेटी बनाकर उसे विचारार्थ रखते फिर उस पर निर्णय देते! इतनी भी क्या जल्दी कि शुक्रवार को प्रस्ताव मिला और दो दिन छुट्टी के बाद ही फैसला?यह जल्दबाजी है या सुयोग्यता का परिचय ?क्या इससे यह न्यायापालिका पर उठने वाली अंगुलियां और होने वाली राजनीति को बढ़ाबा देने का कारण नहीं है? बैसे भी अपने छोटे से कार्यकाल में आदरणीय वेंकैया नायडू जी का ये जल्दी में दिया गया ये दूसरा फैसला है! इससे पहले राज्यसभा में जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवेदन पर मात्र कुछ दिनों में ही दिग्गज नेता शरद यादव की सदस्यता रद्द कर दी थी! बहरहाल कांग्रेस का महाभियोग अब महावियोग में बदल गया है! इस पर कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल अन्य दलीलों के साथ यह भी कह रहे हैं कि यह महाभियोग कांग्रेस का नहीं था बल्कि 64 सांसदों का था,जो इस लड़ाई में उनकी और उनकी पार्टी की हार की हताशा भर है!