तानसेन के दरबार मे दो तहजीबों के सुरों का मिलन

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तानसेन समारोह -2017

 

ग्वालियर । तानसेन की याद में आयोजित हो रहे सालाना संगीत समारोह में सोमवार का दिन कई मायनों में खास और खुशनुमा रहा। प्रात:कालीन सभा में हिंदुस्तानी और यूरोपियन तहजीबों से संगीत रसिक दो चार हुए। देश के जाने माने संगीत साधकों की शुद्ध शास्त्रीय प्रस्तुतियों के साथ यूरोपीय देशों से आए कलाकारों ने जब पश्चिमी सुरों को छेड़ा तो एक बारगी “मिले सुर मेरा तुम्हारा…” की भावभूमि साकार हो उठी। वास्तवं में सुरों का एक ऐसा कोलाज़ बना, जिसमें संगीत का हरेक रंग नुमाया हो रहा था। सभी सांगीतिक प्रस्तुतियों का बड़ी संख्या में मौजूद गुणीय रसिकों ने जी-भरकर आनंद उठाया।
सभा का आगाज़ पारंपरिक ढंग से ध्रुपद केन्द्र ग्वालियर के विद्यार्थियों व आचार्यों द्वारा प्रस्तुत ध्रुपद गायन से हुआ। यह प्रस्तुति विख्यात ध्रुपद गायक श्री अभिजीत सुखदाणे के निर्देशन में हुई। राग ‘तोड़ी’ ताल चौताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे “कौन भरम गुनी हो मन ज्ञानी”।

सुर सम्राट को पाश्चात्य लोक धुनों की स्वरांजलि
सुदूर देशों से आए संगीत साधकों के बैंड ने सुर सम्राट तानसेन को पाश्चात्य लोक धुनों से स्वरांजलि दी। तानसेन समारोह में सोमवार की प्रातःकालीन सभा में विश्व संगीत के तहत हुई इस बैंड की प्रस्तुति में ब्राजील की सुश्री ल्यूजा सेल्स ने गिटार, रशिया की सुश्री एकतरीना एरेस्टोवा ने डबल बेस, श्री पेट्रो कार्नेरो सिल्वा ने पियानो व भारत के श्री आदित्य दत्ता ने भारतीय ड्रम बजाया। इन विदेशी कलाकारों के बैंड ने पारंपरिक पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत, योरिपियन लोक धुनें और खुद के द्वारा तैयार कीं गईं धुनें पेश कर रसिकों को थिरकने के लिए विवश कर दिया।

ऐरी मैं कैसे जाऊँ  पनिया मग रोकत…
दानेदार, बुलंद एवं सुरीली आवाज में जब श्रीमती अमिता सिंह महापात्रा ने राग ‘जौनपुरी’ में बंदिश “ऐरी मैं कैसे जाऊँ पनिया मग रोकत” पेश की तो सुर सम्राट तानसेन का समाधि परिसर उच्च कोटि की ध्रुपद गायिकी से गुंजायमान हो उठा। विभिन्न प्रकार की लयकारियों का उन्होंने बहुत ही सुंदर प्रयोग किया। मुंबई से तानसेन समारोह में प्रस्तुति देने आईं श्रीमती अमिता के गायन से यह आभास हुआ कि ध्रुपद गायकी  से पुरुष कलाकारों के आधिपत्य वाली परंपरा आज टूट गई है। उन्होंने ताल धमार में नोम तोल की सुंदर अलापचारी की। विलंबित, मध्यलय और द्रुत लय में जो अलापचारी आज पेश की उसे गुणीय रसिक भुला नहीं पायेंगे। राग ‘जौनपुरी’ में अलाप और बंदिश से शुरू हुआ उनके गायन का  सिलसिला राग ‘ मधुमाद सारंग’ तक पहुँचा। अमिता के गायन में ठहराव था जिसने उनके गायन को ऊंचाई तक पहुंचाया। सुर अच्छे, गमक और मेंड का काम सुनते ही बन रहा था।
श्रीमती अमिता ने राग “मधुमाद सारंग”  सूल ताल में निबद्ध  तानसेन रचित बंदिश “तुम रब तुम साहिब” की मनोहारी प्रस्तुति के साथ अपने गायन को विराम दिया। उनके साथ पखावज पर सुश्री अनुजा बोरूडे ने संगत की।

तबला-पखावज की जुगलबंदी सुन झूमे रसिक
प्रात:कालीन सभा में भोपाल से आए अंशुल प्रताप सिंह तबला और नईदिल्ली के श्री ऋषि शंकर उपाध्याय पखावज की जुगलबंदी हुई। इन्होंने तीन ताल में विलंबित और द्रुत तीन ताल में अपना वादन किया। तबला-पखावज की जुगलबंदी में कायदे, पल्‍टे व विभिन्न प्रकार की सुंदर-सुंदर परन का प्रयोग सुनाई दिया। साथ ही लग्गी लड़ी का स्वरूप भी स्पष्ट झलक रहा था। श्री ऋषि शंकर उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना से जुगलबंदी की शुरूआत हुई। इस जुगलबंदी में हारमोनियम संगत श्री दीपक खसरावल ने की।

योगेश की ख्याल गायकी से खिल उठे सुर
सोमवार की प्रात:कालीन सभा में मुम्बई से आए मूर्धन्य शास्त्रीय गायक पं. जसराज के शिष्य श्री योगेश हंसवाड़कर की तीसरे कलाकार के रूप में प्रस्तुति हुई। मेवाती घराने के उभरते हुए गायक योगेश ने अपने खयाल गायन के लिये राग “हिजाज सारंग” चुना। इस राग में उन्होंने दो बंदिशें पेश की । एक ताल में निबद्ध विलम्बित बड़ा ख्याल प्रस्तुत किया। बंदिश के बोल थे “चढ़िये मुलख सुर ताल”। तीनताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे “देव विचारी सगुन”। दोनों ही बंदिशों को उन्होंने बेहतरीन तरीके से पेश किया। सुर लगाने का उनका अंदाज़ ठीक अपने गुरु पं. जसराज सरीखा था । राग के विस्तार में सुर खिल उठे और तानों की अदायगी भी शानदार रही। योगेश ने अपने गायन का समापन अड़ाना की बंदिश “माता कालिका भवानी” से किया। उनके साथ तबले पर उस्ताद सलीम अल्लाहवाले और हारमोनियम पर उस्ताद जमीर हुसैन ने संगत की।

अंकुर के वायोलिन वादन ने बाँधा समा
सभा का समापन ग्वालियर के उदयीमान कलाकार श्री अंकुर धारकर के वायोलिन वादन से हुआ। अंकुर ने अपने वादन के लिए समयानुकूल राग भीमपलासी का चयन किया। अंकुर ने इस राग में दो गतें बजाईं। विलंबित और द्रुत दोनों ही गतें तीनताल में निबद्ध थीं। गायकी अंग का उनका वादन माधुर्यपूर्ण था। अंकुर ने अपने वादन का समापन एक मधुर धुन निकालकर किया। उनके साथ तबला संगति श्री गांधार राजहंस ने की।

 

गूजरी महल के समीप सजेगी अंतिम सभा, भजन सोपोरी का होगा संतूर वादन
समारोह की अंतिम सभा ग्वालियर किला स्थित गूजरी महल परिसर के समीप 26 दिसम्बर को सायंकाल सजेगी। सभा की शुरूआत सारदा नाद मंदिर संगीत महाविद्यालय ग्वालियर एवं ध्रुपद केन्द्र भोपाल के ध्रुपद गायन से होगी। इस सभा में श्री कपूर नागर भोपाल क्लेरोनेट वादन एवं सुश्री स्मिता मोकाशी इंदौर गायन होगा। इस सभा का मुख्य आकर्षण पं. भजन सोपोरी वाराणसी का संतूर वादन होगा। इसी के साथ इस साल के तानसेन समारोह का समापन होगा।