भारत में मीडिया की बदलती भूमिका

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हम संचार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और उभरती हुई शक्ति हैं। मंदी का मुकाबला करने के बाद भारत विकास के रास्ते पर वापस आ गया है, लेकिन आगे कई चुनौतियों के साथ। मीडिया ने हमेशा भारत में लोकतंत्र की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है |और निश्चित रूप से भारत पर चिंतित समस्याओं को हल करने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है | यह पूरी दुनिया में संक्षेप में सभी के साथ बात करने का एक आदर्श साधन है | भारत ने अपनी आजादी हासिल करने के बाद से 71 साल हो चुके हैं | भारतीय मीडिया तेजी से बड़ा और विकसित हुआ है और आज मीडिया हर संभव जगह पर फैल गया है – snazzy tabloids से round-the-clock news channels और revamped radio circuit तक | पर कुछ दशक पहले भारत में मीडिया की परिभाषा पत्रिकाओं और समाचार पत्रों से जुडी थी | टेलीविजन एक दुर्लभ वस्तु थी जो केवल शहरी आबादी के पास पाई जाती थी टेलीविजन के आगमन ने विशेष रूप से मीडिया में बहुत सारे परिवर्तन लाए, टेलीविजन के बाद से भारतीय मीडिया में कई महत्वपूर्ण विकास हुए, लेकिन आज की बात की जाए तो मीडिया की एक नई परिभाषा बन चुकी है |

अभीसरण मीडिया आज तेजी से बढ़ रहा है यह निश्चित रूप से buzzword बन गया है पर जहां भारत में मीडिया को लोकतंत्र की “चौथी संपत्ति” माना जाता है, जो सरकार और देश के नागरिकों के बीच एक श्रंखला के रूप में कार्य करनी चाहिए वहीं भारतीय मीडिया आज अपने चमकते हुए विज्ञापनो से राजनीतिक नेताओं की आध्यात्मिक छवि बनाने में जुटी हुई है और यह मीडिया की एक बहुत ही आम प्रथा बन गई है | उच्चतम टीआरपी प्राप्त करने की मानो होड़ सी लग गई है | जिसके कारणवश भारत में मीडिया आज बस एक बिजनेस हाउस बन कर रह गया है, जो मात्र अपने फायदे के लिए किसी भी खबर को सनसनीखेज बनाने को तैयार है | रियलिटी टीवी इस सीजन मे बहुत बड़ा बन चुका है | इस युग में रचनात्मक और सार्थक कवरेज धीरे-धीरे होता जा रहा है और मीडिया ग्लिट्ज और ग्लैमर तक ही सीमित हुई नजर आ रही है |

हालांकि मीडिया एक अनिवार्य उपकरण है लेकिन इससे सामाजिक जिम्मेदारी जुड़ी हुई है और अब समय आ गया है जब भारतीय मीडिया द्वारा कुछ आत्म निरीक्षण की आवश्यकता है | कहा जाता है ना *”एक कलम तलवार से शक्तिशाली है”* | यदि कलम को सही उपयोग में डाल दिया जाता है तो दुनिया बढ़ सकती है, यदि नहीं तो यह भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता है |

 

 

अंजलि थपलियाल

विचारक, लेखिका

नवसंवाद , व्यूजपॉइंट