साफ पानी को तरसेगी भावी पीढ़ी

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विश्व जल दिवस विशेष

जनसंख्या के बढ़ते दबाव और जीवनस्तर में सुधार के कारण पानी की मांग बढ़ती जा रही है, लेकिन सीमित जल संसाधनों की वजह से 2025 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी के समक्ष पानी का गंभीर संकट उत्पन्न होने की आशंका है। सिंचाई के पानी की किल्लत के कारण कृषि उपज कम होने से गरीबों को दो जून की रोटी मिलनी मुश्किल हो जाएगी। पीने तथा सफाई आदि कामों के लिए साफ पानी न मिलने से वंचित तबके का स्वास्थ्य भी खराब होगा तथा पानी के बंटवारे को लेकर टकराव और संघर्ष भी बढ़ेगा।

पृथ्वी के तीन चौथाई भूक्षेत्र पर पानी है, लेकिन इसमें से 97.3 प्रतिशत में समुद्र है। केवल 2.7 प्रतिशत ही इस्तेमाल योग्य पानी है। इसमें से भी 1.74 प्रतिशत हिमनद और बर्फ के रूप में है।

पेयजल संकट इतना भयावह होगा कि इसको लेकर मार-काट मचेगी, राज्यों के बीच विवाद बढ़ेंगे और शताब्दी अंत तक देशों के बीच युद्ध का कारण भी पानी बनेगा। पानी को लेकर 60 सालों में 200 अंतरराष्ट्रीय समझौते हुए और हिंसा के 37 बड़े मामले रिपोर्ट हुए हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की द्वितीय वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट के अध्ययन से पता चलता है कि आज जिस रफ्तार से पानी खर्च हो रहा है, यदि यहि रफ्तार जारी रही तो सन् 2025 तक दुनिया की दो तिहाई जनसंख्या को पानी के लिए जूझना पड़ेगा।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार देश में प्रति वर्ष करीब 1869 वर्ग घनमीटर भूजल उपलब्ध होता है जिसमें से मात्र 690 सीसीएम का ही इस्तेमाल हो पाता है। शेष 80 प्रतिशत पानी बिना किसी इस्तेमाल के समुद्र में बहकर बेकार हो जाता है। दुनिया के 9 प्रतिशत बड़े बांध भारत में हैं, लेकिन इनमें कुल उपलब्ध पानी का मात्रा 20 प्रतिशत ही संग्रहीत हो पाता है। आजादी के पहले देश में मात्र 300 बांध थे जबकि इस समय इनकी संख्या करीब 4 हजार 300 है।

देश में कुल उपलब्ध पानी का 81 प्रतिशत सिंचाई के काम में, 3.8 प्रतिशत घरेलू तथा इतना ही औद्योगिक कामों में, 0.9 प्रतिशत ताप बिजली उत्पादन में और 10.5 प्रतिशत अन्य कामों में इस्तेमाल होता है।

पानी की जरूरत मोटे तौर पर तीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है- खेती, उद्योग और इंसानों के उपयोग हेतु। इन तीनों ही जगह पानी का अपव्यय होता है जिसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

पानी के अत्यधिक दोहन के कारण कुछ स्थानों पर जलस्तर हर वर्ष 25 से 30 फुट कम होता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण के कारण प्रति व्यक्ति के लिए 2200 घनमीटर पानी उपलब्ध था, लेकिन 2050 तक प्रति व्यक्ति को मात्र 1100 घनमीटर ही पानी मिल सकेगा।

लगातार अवर्षा या कम वर्षा की वजह से कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में सरकारी और निजी क्षेत्रों में भूजल दोहन की गति ने भूकार्य में पानी को अंतिम सीमा पर ला दिया है। जमीन से पानी इतनी तेजी से निकाला जा रहा है कि पानी का स्तर निरंतर कम होता जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1981-90 के दशक को विश्व जल शताब्दी के तौर पर सभी देशों को मनाने का अनुरोध किया था। यह शताब्दी भी खत्म हो गई, लेकिन आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है।

विकास के पथ पर तेजी से डग भरने के दावों के बावजूद हमारे देश की 80 प्रतिशत आबादी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। दूर-दराज में बसे हमारे गांवों के बाशिंदे अपना कंठ गीला करने के लिए अनेक किलोमीटर की दूरी तय कर पीने का पानी लाते हैं।

अधिकृत आंकड़ों के अनुसार पिछले चालीस वर्षों में देहात के 20 करोड़ लोगों को पेयजल उपलब्ध जरूर कराया गया लेकिन देश की आधी आबादी के लिए सुरक्षित पेयजल अभी सपने की ही वस्तु है। आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग 2 लाख गांवों में पेयजल लाने के लिए अभी भी दो किलोमीटर का फासला तय करना पड़ता है। देश के पचास प्रतिशत से अधिक गांवों में जल की उपलब्धि काफी सीमित है। अर्थात् वहां केवल एक ही स्रोत है। इस कारण भारत में पेयजल समस्या काफी विकट है।

भारत की विशाल आबादी तथा इसकी वृद्धि दर के मद्देनजर 2025 तक करीब 90 प्रतिशत क्षेत्र में कृषि, घरेलू, औद्योगिक और पर्यावरण से संबंधित कामों के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल सकेगा।