सारे ब्रह्मांड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती

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माता बगलामुखी जयंती विशेष

माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। सारे ब्रह्मांड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद-विवाद में सफलता के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा जातक का जीवन निष्कंटक हो जाता है। दशमहाविद्याओं में ही एक भगवती बगलामुखी की उपासना शत्रुबाधा और बुरी मंशाओं को असफल बनाने में असरदार व अचूक मानी गई है। शास्त्रों में देवी की इस शक्ति को ‘स्तम्भन’ कहा गया है। सरल शब्दों में कहें तो यह बुरे भाव या क्रियाओं को बेअसर करती या बांध देती है। यह भक्त के मन से भी क्लेश व दोष रूपी शत्रुओं का अंत करती है। धार्मिक मान्यताओ के अनुसार वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को माँ बगलामुखी का अवतरण दिवस कहा जाता है। जिस कारण इस तिथि को बगलामुखी जयंती मनाई जाती है

हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है। इसलिए, हल्दी का रंग पीला होने से इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है।

इनके भैरव महाकाल हैं।माँ बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं. माँ बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है.

देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है.पीताम्बरा की उपासना से मुकदमा में विजयी प्राप्त होती है। शत्रु पराजित होते हैं। रोगों का नाश होता है। साधकों को वाकसिद्धि हो जाती है। इन्हें पीले रंग का फूल, बेसन एवं घी का प्रसाद, केला, रात रानी फूल विशेष प्रिय है। पीताम्बरा का प्रसिद्ध मंदिर मध्यप्रदेश के नलखेडा(जिला-आगर मालवा ) में स्थित है