सुर सम्राट की जन्मस्थली में बहे मीठे-मीठे सुरों ने कराया मखमली अहसास

0
178

 

तानसेन समारोह – 2017

 

ग्वालियर । सुर सम्राट तानसेन की जन्मस्थली बेहट में सजी आठवीं संगीत सभा में बहे सुर मखमली अहसास करा गए। संगीत कलाकारों ने ऐसा झूमके गाया-बजाया कि रसिक सुध-बुध खो बैठे। इस साल के तानसेन समारोह के तहत यह सभा बेहट में मंगलवार को भगवान भोले के मंदिर के नीचे और झिलमिल नदी किनारे घनी एवं मनोरम अमराई के बीच सजी। यह वही जगह थी जहाँ सुर सम्राट का बचपन संगीत साधना और बकरियाँ चराते हुए बीता था। लोक धारणा है कि तानसेन की तान से ही निर्जन में बना भगवान शिव का मंदिर तिरछा हो गया था। यह भी किंवदंति है कि 10 वर्षीय बेजुबान बालक तन्ना उर्फ तनसुख भगवान भोले का वरदान पाकर संगीत सम्राट तानसेन बन गया।

छोड़ के न जा रे सैंया मोरे….
भोपाल से पधारे जनाब जावेद उस्मानी ने जब सुर सम्राट तानसेन की दहलीज पर पहाड़ी ठुमरी “छोड़ के न जा रे सैंया मोरे” सुनाई, तो गुणीय रसिक विरहरस में डूब गए। जनाब उस्मानी ने विख्यात संगीतज्ञ उस्ताद नजीर खाँ से किराना घराने और उस्ताद नसीर अहमद खाँ से दिल्ली घराने की गायकी सीखी है। उन्होंने बेहट की सभा में अपने गायन के लिये राग “मियाँ की तोड़ी” को चुना। इसमें विलंबित एक ताल में बड़ा ख्याल प्रस्तुत किया। बंदिश के बोल थे – “सगुन विचारे रे”। इसके बाद उन्होंने द्रुत तीन ताल में प्रसिद्ध बंदिश “अब मोरी नैय्या पार करो” पेश कर बेहट की फिजा को मीठे-मीठे रसों की फुहारों से भिगो दिया। उन्होंने अपने गायन में तोड़ी जैसे कठिन राग का निर्वहन बड़ी कुशलतापूर्वक किया। जावेद उस्मानी के साथ तबले पर उस्ताद शहनवाज खान, हार्मोनियम पर श्री जितेन्द्र शर्मा व सारंगी पर श्री हनीफ हुसैन ने संगत की।

तबले की जुगलबंदी से गूँजी बेहट की फिज़ा
बेहट की सभा में दूसरी प्रस्तुति में तबला वादन की जुगलबंदी हुई। ग्वालियर के उभरते हुए युवा तबलाकार श्री विनायक शुक्ला तथा श्री विजय गुप्ता सेठ के तबला वादन से मनोरम अमराई और झिलमिल नदी का शांत किनारा संगीतमय हो गया। प्रसिद्ध तबला वादक डॉ. मुकेश सक्सेना से ये दोनों नवोदित कलाकार गुरू-शिष्य परंपरा के तहत तबला वादन के हुनर सीख रहे हैं। इन्होंने अपने वादन के लिये ताल-तीन ताल का चयन किया, जिसमें कायदा व परन प्रस्तुत की। लग्गी बड़ी व सवाल जवाब तथा विभिन्न घरानों की बंदिशों की प्रस्तुति सुन रसिक मंत्रमुग्ध हो गए। तबला जुगलबंदी में सारंगी पर जनाब मोहम्मद अहमद खान ने नफासत भरी संगत की।

उदयीमान गायक जैन बंधु की ख्याल गायकी ने बांधा समा
किशोरवय आयु से ही बड़े-बड़े संगीतज्ञों के चहेते बन चुके ग्वालियर के नन्हे-मुन्हे गायक शरद जैन एवं ऋषि जैन ने जब राग “मुल्तानी” विलंबित एक ताल में “गोकुल गाँव का छोरा” प्रस्तुत किया तो बड़ी संख्या में मौजूद रसिक वाह-वाह कर उठे। बुलंद एवं दानेदार मधुर आवाज के धनी जैन बंधु ने इसके बाद द्रुत ताल में छोटा ख्याल “आंगन में नंदलाल” की प्रस्तुति दी। इसके पश्चात तीन ताल में एक तराने का गायन किया। जैन बंधु ने अपने गायन का समापन एक भजन “चलो मन गंगा जमुना धीरे” गाकर किया। इनके सुश्राव्य गायन में असीम संभावनायें झलक रहीं थीं। मुल्तानी जैसे राग का निर्वहन उन्होंने बखूबी ढंग से किया। सिलसिलेवार व तानों का सफाईयुक्त गायन सुनते ही बन रहा था। इनके साथ तबले पर श्री विकास विपट व हार्मोनियम पर श्री विवेक जैन ने संगत की।

ध्रुपद गायन से हुई सभा की शुरूआत
बेहट में सजी आठवीं संगीत सभा की शुरूआत पारंपरिक ढंग से तानसेन स्मारक केन्द्र बेहट के ध्रुपद गायन से हुई। साधना केन्द्र के विद्यार्थियों ने राग भैरव में ताल-चौताल में निबद्ध बंदिश “प्रात: समय यशोदा जननी” की प्रस्तुति दी। इस ध्रुपद की प्रस्तुति में पखावज पर श्री जयवंत गायकवाड़ ने संगत की। इसके बाद साधना संगीत महाविद्यालय के विद्यार्थियों व आचार्यों ने राग “देशकार” में चौताल में निबद्ध बंदिश पेश की। बंदिश के बोल थे – “गणपति गणनायक”। श्रीमती स्मिता महाजनी के निर्देशन में यह प्रस्तुति हुई। पखावज पर श्री अविनाश महाजनी ने संगत की। इन दोनों ही प्रस्तुतियों को रसिकों की भरपूर सराहना मिली।