आखिर ये तो होना ही था

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आखिर ये तो होना ही थ

श्रीगोपाल गुप्ता

भारतीय संविधान में अब तीन तलाक का कोई अस्तत्व नहीं है मगर देश की राजनीति में इसका चलन अभी भी बना हुआ है। इसका उदाहरण आज देश के सामने जब आया तब भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू-काश्मीर में अपने बेमेल गठबंधन पिपुल्स डैमोक्रेटिक फ्रंट पार्टी को तलाक, तलाक, तलाक कहकर उससे पीछा छुड़ा लिया। इसके साथ ही तीन वर्ष पहले सन् 2015 में चार महिनों की मशक्कत के बाद बनी जम्मू-काश्मीर की गठबंधन सरकार का पतन हो गया है।हालांकि भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व जम्मू-काश्मीर के प्रभारी राममाधव ने पीडीपी से संबंध तोड़ने की बजह देशहित में बताई अब यह शोध का विषय हो सकता है कि काश्मीर में पाकिस्तान परस्त अलगाववादी और अन्य देश विरोधी संगठनों से सहानुभूति रखने वाली पीडीपी के साथ सरकार बनाते समय भी इस कदम को भाजपा ने देशहित में बताया था। मगर काश्मीर में मौजूद खतरनाक हालातों के मद्दे- ए -नजर भाजपा के लिये यह गठबंधन तोड़ना अति आवश्यक व मजबूरी हो गया था। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काश्मीर घाटी में अमन और विकास के फेर में अपनी मान्य छबि के विपरीत कई अवि विस्वसनिय कदम उठाये। मगर हालात सुधरने के बजाय और बदतर हो गये थे इसलिए काश्मीर घाटी की फांस अब मोदी के साथ-साथ पूरे भाजपा के गले की हड्डी बन चुकी थी। दरअसल ये बेमेल गठबंधन था जो कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के खिलाफ था। चूंकि जिस समय गठबंधन हुआ था उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता चरम थी इसलिए इसका असर देश के क्ई विधानसभा चुनाव में असर नहीं कर पाया मगर अब लोकप्रियता का गिराफ नीचे की और है और जनता पिछले चार साल में कश्मीर में शहीद हुये जवानों का हिसाब मांगने पर उतर आई है।

जबकि हालत यह है कि जम्मू-काश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के सवाल पर भाजपा और संघ का स्यंमसेवक सहमा-सहमा सा है। पिछले तीन सालों में काश्मीर में हालात बहुत ही खतरनाक मोड़ पर हैं, यह सही है कि अस्सी हजार करोड़ रुपये के विशेष पैकेज सहित विकास और रोजगार की ढैरों सौगातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काश्मीर राज्य को दी। इसके अलावा मुख्यमंत्री मुफ्ती मेहाबूबा की कई बैजा मांगों को मानकर पार्टी कार्यकर्ता और देश के अवाम की बेवजह नाराजी मोल ली बावजूद हालात सुधरने के और खतरनाक हो गये। चूंकि अगले साल देश में आम चुनाव होने हैं ऐसे में पार्टी कोई रिस्क लेना नहीं चाहती। गठबंधन तोड़ना का अथवा टूटने का सबसे बड़ा कारण मुख्यमंत्री मुफ्ती मेहाबूबा है जो यह चाहती थी रमजान के महिने में लागू भारतीय सेना का एक तरफा सीजफायर जारी रहे।मगर इस एक महिने में अशांत घाटी के बिगड़े हालात इसकी गवाही नहीं देते। स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई कि इस एक महिने में 267%प्रतिशत आंतकी हमले बढ़ गये। 17 अप्रैल से 17 मई तक जहां घाटी में 18 आंतकी हमले हुये वहीं रमजान माहे में 17 मई से 17 जून तक 66 हमले हुये।रमजान में सेना के सर्च आपरेशन पर रोक लगी थी लेकिन जबावी कार्यवाही का बिकल्प खुला था। इस दौरान जम्मू-काश्मीर में 22 आंतकी मारे गये जबकि सेना, बीएसएफ और पुलिस के 17 जवान शहीद हो गये। सुरक्षा बलों पर रिकार्ड तोड़ 20 ग्रेनेड हमले हुये। मगर बावजूद इसके मेहबूबा और सीजफायर पर अड़ी थी। इधर अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेल रही मोदी सरकार इस बात से भी सावधान हो गई कि सेना में भी धीरे-धीरे रोष बढ़ रहा है। बैसे भी मोदी सरकार इन तीन वर्षों में अपनी एक भी हसरत पूरी नहीं कर सकी जो पार्टी की वर्षों पुरानी मांगे थी। बहरहाल चारो तरफ से चुनौती झेल रही सरकार के इस कदम से यह तय हो गया कि आखिर ये तो होना ही था।