मीडिया पर खूनी कहर,जिम्मेदार कौन ?

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मीडिया पर खूनी कहर,जिम्मेदार कोन ?

श्रीगोपाल गुप्ता

रविवार की रात और सोमवार की अल सुबह मीडिया के पत्रकारों के लिये काली और असहनीय दर्द भारी साबित हुई , जिसकी जितने कड़े शब्दों में निंदा की जाये संभवतः कम ही है! रविवार को देर रात्री में जहां बिहार के आरा जिले के गड़हनी थाना क्षेत्र में दो पत्रकारों दैनिक भास्कर के नवीन निश्चिल और एक मैगजीन के पत्रकार विजय सिंह की पूर्व प्रधान के पति मोहम्मद हरसू और उसके बेटे ने नंहसी पुल पर अपने स्कार्पियों वाहन से कुचल कर मौत के घाट उतार दिया! वे दोनों रामनवमी के जुलूस का कवरेज करने के बाद देर रात्री में अपनी बाईक से घर लोट रहे थे! सोमवार को सुबह 9 बजे के आसपास पत्रकार जगत इस खबर को पढ़ ही रहा था कि अचानक भिण्ड के ईमानदार पत्रकार संदीप शर्मा को ट्रेक से कुचल कर मार देने का लोमहर्षक समाचार आ गया जो खबरनबीस बिरादरी और संदीप के परिजनों के लिए किसी बज्रपात से कम नहीं था! संदीप शर्मा चंबल और मध्यप्रदेश का वह कर्मठ और ईमानदार चेहरा था ,जिसने गत जुलाई 2017 में चंबल की छाती चीरने बाले रेत माफीया, पुलिस और नेताओं के गठवन्धन , घिघौने तिलिस्म को तोड़ने का काम किया था! उन्होने एक स्टिंग आपरेशन के तहत पूरे देश को दिखाया कि किस तरह पुलिस और नेताओं की सांठगांठ व धनलिप्सा के कारण उनके संरक्षण में रेत माफीया कितनी बेदर्दी के साथ चंबल का सीना चीरकर अरबों रुपये का रेत रोज निकाल रहे हैं!संदीप के इस बेबाक स्टिंग आपरेशन की जद में भिण्ड जिले के ही मूल निवासी और एसडीपीओ इन्द्रवीर सिंह भदौरिया व रेत माफीया पूरी तरह से घिर गये!इस स्टिंग आपरेशन के बाद भिण्ड और पूरे प्रदेश में सरकार, पुलिस और जनता में हड़कंप मच गया! और मचता भी क्यों नहीं, क्योंकि आज दौर में जब मीडिया भी बदनामी के अंधेरे में है, ऐसे में संदीप के इस स्टिंग आपरेशन ने मीडिया को भी अंधेरे में से निकालने का काम किया था!हालांकि ये संदीप का पहला आपरेशन नहीं था, इसके पूर्व में भी एक अन्य एसडीपीओ अग्रवाल उनके एक स्टिंग आपरेशन की वली चढ़ चुके थे! मगर अवैध रेत उत्खनन के इस आपरेशन के बाद ही संदीप कथित पुलिस, नेता और रेत माफीयाओं की आंखो में चढ़ गये! इसके बाद ही उन्हें पुलिस,नेता और माफिया की धमकी मिलना शुरु हो गया था!जिससे बचाव के लिए संदीप ने देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, डीजीपी , डी आई जी, सहित सभी आला अधिकारियों से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई मगर सुरच्छा की आवाज नक्कार खाने में तूती की तरह ही साबित हुई और अंततः संदीप जो अभी एक और बड़ा खुलासा करने ही जा रहे थे कि, सच्चाई के लिए अपनी जान की कुर्बानी देनी पढ़ी!

संदीप बहुत आकर्षित सौम्य और सच्ची पत्रकारिता के प्रति बेहद जागरुक और निष्ठावान पत्रकार थे! मेरी उनसे पहली मुलाकात उनके काल कल्वित होने से मात्र दो दिन पहले शनिवार 24 मार्च को उस समय हुई, जब मैं अपने पत्रकार साथियों सहित एक पत्रकार सम्मेलन में व्यापार मंडल की धर्मशाला भिण्ड गया था! जैसे ही मेरी कार दिन के 12 बजे धर्मशाला के गेट पर पहुंची और मेने गेट खोला ही था कि संदीप लपक कर मेरे पास आये और हाथ बढ़ाकर बड़ी आत्मियता और जोश के साथ से मेरा और मेरे साथियों का स्वागत किया! जब मेने उन्हें अपना परिचय देने की कोशीश की तो वे बीच में ही बोलो कि मैं आपको जानता हूँ! फिर वे हम सबको नास्ता कराने ले गये, बहुत सह्रदय से हम सबको उन्होने जलपान कराया और मुरैना आने का मुझसे वादा भी किया था, किन्तु नियती को ये मंजूर ही न था! मगर संदीप सच्ची पत्रकारिता के लिये शहादत देने वाले पहले पत्रकार नहीं हैं!अपनी सच्ची पत्रकारिता को अंजाम देने वाले बिहार के दो पत्रकार नवीन और विजय सिंह मात्र एक दिन पूर्व रविवार की रात को ,अपने विरुद्ध छापी गई एक खबर से नाराज पूर्व प्रधान के सिरफिरे पति और उसके पुत्र के शिकार होकर शहीद हो गये! पत्रकारों की सुरक्षा के लिए काम करने वाली एक विश्व विख्यात संस्था कमिटी टू प्रोटेक्ट जनर्लिस्टस की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में भ्रष्टाचार कवर करने वाले पत्रकारों की जान को विश्व में सबसे ज्यादा खतरा है! उन्हें काम के दौरान भी पुरी सुरक्षा नहीं मिलती है! सन् 1992 के बाद 2015 तक तकरीबन तीन दर्जन पत्रकारों का कत्ल उनके काम करने के दौरान हो गया ! मगर दुखद पहलु यह है कि इनमें से किसी एक मामले में भी आरोपियों को कोई सजा नहीं हुई! दरअसल भारत में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई अलग से कानून नहीं है! 70 सालों से सरकारें, अधिकारी और नेता मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहकर सिर्फ बहलाने का काम कर रहे हैं, जबकि संविधान में चौथे स्तम्भ का कोई उल्लेख ही नहीं है !संविधान की धारा मात्र 19(1)क, पर पत्रकार और पूरी प्रेस की अभिव्यक्ति की धारणा डटी हुई है! जो पत्रकारों को लिखने की बोलने की आजादी की गांरटी तो देता है मगर सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है! इसलिए सरकार को अब चाहिये कि चौथे स्तम्भ की स्तुती करना छोड़े और न्यायापालिका, कार्यपालिका और विधायका की तरह ही चौथै स्तम्भ के लिए भी जान जोखिम में डालने वाले पत्रकार और मीडिया के लिये विशेष कानून बनाने का काम अति शीघ्र करे! अन्यथा रविवार की काली रात और सोमवार की काली सुबह का मीडिया पर खूनी कहर का जिम्मेदार प्रशासन व सरकार को ही माना जायेगा!