“उप चुनाव” ये हार थी या कुछ और था..?

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“उप चुनाव” ये हार थी या कुछ और था..?

श्रीगोपाल गुप्ता  :: 14 मार्च को आये 3 लोकसभा उप चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा! बात अगर बिहार की अररिया लोकसभा उप चुनाव कराने की जाये तो भाजपा पर हार का तार्किक जबाव उपलब्ध है! मगर पार्टी उप्र के मुख्यमंत्री और “हिन्दु पोस्टर बाँय” योगी आदित्यनाथ और प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव मोर्य की छोड़ी गई सीट गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट की हार पर कुछ खास बोलने से परहेज कर रही है! हालांकि मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम ने माना कि हम अत्याधिक आत्म विश्वास में और कम वोटिंग और अचानक सपा और बसपा के एक साथ आ जाने की वजह से हारे! मगर ये कहना न काफी होगा, कि मात्र इन कारणों से हारे हैं? कारण और भी हैं जिसपर पार्टी को 2019 के आम चुनाव को देखते हुये गहरा आत्म चिंतन करना पड़ेगा क्योंकि ये पराजय मात्र योगी की ही नहीं है! इसके मुख्य किरदार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा के आधुनिक चाणक्य अमित शाह भी हैं क्योंकि 30 साल बाद पहली दफा उन्होने गोरखपुर में “मठ ” और उसके बाहर के किसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया! दरअसल फूलपुर में हार की पटकथा गत एक दिसंबर को जब लिखी गई थी तब प्रदेश में सपन्न हुये नगरीय निकाओं के चुनाव में डिप्टी सीएम केशव मोर्य अपने ही ग्रह नगर पंचायत सिराथू से पार्टी के उम्मीदवार को नहीं जिता पाये!भाजपा के उम्मीदवार को एक भोला यादव नाम के एक अंजान निर्दलीय ने पटकनी दे दी थी! लगभग यही कहानी सूबे के मुख्यमंत्री की निजी राजधानी गोरखपुर में भी दोहराई गई! योगी भी अपने वार्ड में और क्षत्रियों के गढ़ गोरखनाथ मठ (मंदिर) के चारो तरफ की नगर निगम सीट हार गई!मगर किन की वजह से हार गई? इसके अलावा भाजपा प्रत्याशी की हार की सबसे बड़ी वजह रही प्रधानमंत्री और अमित शाह द्वारा 30 साल में पहली मर्तबा योगी की मर्जी के विपरीत मठ के किसी व्यक्ति को टिकट देने की जगह मठ विरोधी ब्राह्मण जाति के व्यक्ति उपेन्द्र दत्त शुक्ला को टिकट देना!जबकि “हाता और मठ”की क्ई दशक पुरानी रंजिस पूर्वाचंल उत्तर प्रदेश में विख्यात है! ऐसे में भाजपा की हार में मठ की जीत को अंदरखाने देखा जा रहा है!

दरअसल सन् 1950 के दशक में मठ के तत्कालीन मंहत दिग्विजय नाथ और ब्राह्मण समाज के सर्वमाण्य समाजसेवी पं. सुरति नारायण मणि त्रिपाठी के बीच अटूट संबंध थे, दोनों ने आधुनिक गोरखपुर के लिए मजबूत आधार शिला रखी! मगर इसी बीच किसी बात पर मंहत दिग्विजय नाथ ने पं. सुरति नारायण की किसी बात पर बेइज्जती कर दी! ब्राह्मण समाज पंडित जी के इस अपमान को भुला नहीं पाया नतीजन दोनों के बीच खाई बड़ती गई! मंहत जहां क्षत्रिय समाज के खेवनहार बने तो पंडित जी ने ब्राह्मण समाज की बागडोर अपने हाथ में थामी! तब से अब तक पूर्वाचंल उत्तर प्रदेश में वर्चस्व की जंग दोनो जातियों में अभी तक जारी है! जिसके शिकार दोनों जाति के दिग्गज राजनीतिक नेता होते रहे हैं! मंहत दिग्विजय नाथ के बाद मठ की कमान मंहत अवैधनाथ, वीरेन्द शाही और मंहत योगी आदित्यनाथ ने सभाली तो ब्राह्मण समाज की बागडोर क्ई दफा के विधायक और कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह मंत्री मंडल में मंत्री रहे पंडित हरीशंकर तिवारी ,पूर्व मंत्री और अब हत्या के मामले में सजायाफ्ता अमरमणी त्रिपाठी और श्री प्रकाश शुक्ला ने संभाली! इस आपसी दुस्मनी के शिकार केवल उपेन्दर शुक्ला ही नहीं हुये हैं, 1971 में प्रदेश की मिलीजुली सरकार के मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह भी हो चुके हैं !जब ने मुख्यमंत्री की कमान संभालने के बाद सदन का सदस्य बनने के लिए गोरखपुर की मनीरामपुर विधानसभा से उप चुनाव में खड़े हुये तो ब्राह्मण समाज के अनजान व्यक्ति और अमर उजाला के पत्रकार रामाकृष्ण द्विवेदी ने उन्हें चुनाव हरा दिया था! वैसा ही कुछ-कुछ इस उप चुनाव में भी हुआ! मुख्यमंत्री योगी ने शुक्ला को जिताने के लिए गोरखपुर में 17 जनसभाएं की वहीं 14 मंत्रियों के साथ 8 सांसद और 10 विधायक गोरखपुर में भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव तक डटे रहे, मगर वे समाजवादी पार्टी के प्रवीण निषाद को जीतने से नहीं रोक पाये! गोरखपुर मठ से प्रदेश के मुख्यमंत्री बनकर ताकतवर नेता के रुप में उभरे योगी लाख जतन करने के बावजूद मठ, युवा हिंदु वाहनी और भाजपा कार्यकर्ताओं को बूथ पर बिठाने में और अपनी पार्टी के समर्थक मतदाताओं को बूथ तक लाने में बुरी तरह से असफल हो गये! यह मानने की भी कोई ठोस बजह भी दिखलाई नहीं पढ़ रही कि मुख्यमंत्री के गढ़ में पार्टी के कार्यकर्ता और मठ के समर्थक अकारण ही बूथों से दूर रहे? अब अगर भाजपा प्रत्याशी की हार को दशकों पुरानी दो समाजों के बीच चली आ रही आपसी वर्चस्व की लड़ाई को न माना जाये तो और क्या माना जाये?इसलिये कहा जा सकता है कि भाजपा नेतृत्व को इस की समीक्षा में ये तय करना पड़ेगा कि “ये हार थी या कुछ और था”?