क्या आप जानते है राष्ट्रगान पर उच्चतम न्यायालय का आदेश ?

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प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

मनमोहन जोशी :  जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है जो मूलतः बंगाली भाषा में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखा गया था।

राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेण्ड हैं। कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान संक्षिप्त रूप मे भी गाया जाता हैं, इसमें प्रथम तथा अन्तिम पंक्तियाँ ही बोलते है जिसमें लगभग 20 सेकेण्ड का समय लगता हैं। इसे सर्वप्रथम 27 दिसम्बर 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दोनो भाषाओं में (बंगाली और हिन्दी) गाया गया था। पूरे गान मे 5 पद है।

राष्ट्रगान संबंधित नियम व विधियाँ

राष्ट्रगान बजाने के नियमों के अनुसार राष्ट्रगान का पूर्ण संस्करण निम्नलिखित अवसरों पर बजाया जाता हैंः-

1. नागरिक और सैन्य अधिपष्ठापन के दौरान ।

2.  जब राष्ट्र सलामी देता हैं ( इसका अर्थ है राष्ट्रपति/राज्यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर को विशेष आवसरों पर सलामी शस्त्र प्रस्तुत किया जाता है।

3.  परेड के दौरान चाहे उपरोक्त में संदर्भित विशिष्ट अतिथि उपस्थित हो या नही ।

4.  औपचारिक राज्य कार्यक्रमों और सरकार द्वारा आयोजित अन्य कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन पर और उनके वापस जाने के अवसर पर।

5.  आॅल इंडिया रेडियो पर राष्ट्रपति के राष्ट्र को संबोधन से तत्काल पूर्व और उसके पश्चात ।

6.  राज्यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर के उनके राज्य/संघ राज्य के अंदर औपचारिक राज्य कार्यक्रमों में आगमन पर तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के समय

7.  जब राष्ट्रीय ध्वज को परेड में लाया जाए ।

9.  जब रेजीमेंट के रंग प्रस्तुत किए जाते हैं।

10. नौसेना के रंगो को फहराने के लिए।

11. राष्ट्रगान का संक्षिप्त संस्करण मेस मे सलामती की शुभकामना देते समय बजायाा जाएगा।

12. राष्ट्रगान उन अन्य अवसरों पर बजाया जाएगा जिनके लिए भारत सरकार द्वारा विशेष आदेश जारी किए गए हैं।

13. आम तौर पर राष्ट्रगान प्रधानमंत्री के लिए नही बजाया जाता जबकि ऐसें विशेष अवसरों पर बजाया जाए।

 

राष्ट्रगान को सामूहिक रूप से गाना

राष्ट्रगान का पूर्ण संस्करण निम्नलिखित अवसरों पर सामूहिक गान क साथ बजाया जाएगा      :-

1.  राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के अवसर पर ।

2.  सांस्कृतिक अवसरों पर या परेड के अलावा अन्य समारोह पूर्ण कार्यक्रमों में।

3  सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में राष्ट्रपति के आगमन के अवसर पर (परंतु औपचारिक राज्य कार्यक्रमों और सामूहिक कार्यक्रमों के अलावा) और इन कार्यक्रमों से उनके विदा होने के तत्काल पहले।

4.  राष्ट्रगान को गाने के सभी अवसरों पर गाया जा सकता हैं। जहाँ राष्ट्रीय भावना जगाना हो।

5.  यह संभव नही है कि अवसरों की कोई एक सूची दी जाए, जिन अवसरों पर राष्ट्रय गान को गाना (बजाने से अलग) गाने की अनुमति दी जा सकती हैं। परंतु सामूहिक गान के साथ राष्ट्रगान  को गान पर तब तक कोई आपत्ति नही हैं जब तक इसे मातृभूमि को सलामी देते हुए आदर के साथ गाया जाए और इसकी उचित गिरमा को बनाए रखा जाए।

 

विवाद

क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता हैं, अथवा नही?  यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोए एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य AIR 198 SC 748 (3) नाम के एक वाद मे उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था। क्योकि इन्होने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया था। सर्वोच्य न्यायालय ने इनकी याचिका स्वीकार कर इन्हे स्कूल को वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नही हैं तो इसका मतलब यह नही कि वह इसका अपमान कर रहा हैं। अतः इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नही किया जा सकता।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में 30 नवम्बर 2016 को एक निर्णय दिया कि सिनेमा हाल में किसी भी फिल्म की शुरुआत में राष्ट्रीय गान का प्रसारण अनिवार्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय गान के समय परदे पर राष्ट्रीय ध्वज का होना भी अनिवार्य है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया कि राष्ट्रीय गान तथा राष्ट्र ध्वज के प्रोटोकॉल का पालन करना भी अनिवार्य रहेगा। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संजय मिश्रा तथा अमित राय की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल रिट याचिका के अंतर्गत यह निर्णय दिया।

यह याचिका श्याम नारायण चैकसे, जो भोपाल के एक सेवानिवृत्त इंजीनियर है, ने दायर की थी। चैकसे ने यह याचिका मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में तब दायर की थी, जब उन्होंने फिल्म ‘कभी ख़ुशी कभी गम’ के निर्माता व निर्देशक कारण जौहर पर अपनी फिल्म के एक दृश्य में राष्ट्रीय गान के अपमान का आरोप लगाया था।

चैकसे ने अपनी याचिका में यह भी दावा किया कि  सिनेमा हाल में राष्ट्रीय गान के प्रसारण के समय दर्शक अपनी सीटो पर खड़े नहीं हुए थे। तब न्यायाधीश मिश्रा ने यह फैसला दिया था, कि  यह फिल्म सभी सिनेमाघरों से तब तक हटायी जाए जब तक फिल्म से वह दृश्य नहीं  हटाया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2004 में इस निर्णय को वापस ले लिया। इसके उपरान्त चैकसे ने 2004 में सर्वोच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ एक पुनर्याचिका दायर की। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले पर पुनर्विचार करते हुए ये स्वीकार किया कि इस मामले से जुड़े प्रश्नों पर कार्यवाही की जायेगी।

याचिकाकर्ता का मुख्य  तर्क यह था कि राष्ट्रीय गान बहुत विविध परिस्थितियों में गाया जाता है, जो जायज नहीं होते है। सुप्रीम कोर्ट ने याची के तर्क पर विचार करते हुए कहा कि यह हर एक नागरिक का कर्तव्य है कि वह  राष्ट्रीय गान का सम्मान करे।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने देशभर के बुद्धिजीवीवर्ग तथा कानून विशेषज्ञों में एक बहस छेड़ दी है। इसके अलावा निर्णय के आशय तथा प्रकरण पर भी कुछ भ्रांतियाँ हैं । इन सब मसलों को स्पष्ट रूप से समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निम्नलिखित पांच बिन्दुओं के अंतर्गत समझा जा सकता हैः-

1.  सिनेमा हाल में राष्ट्रीय गान बजने से पहले प्रवेश और निकास दरवाजे बंद होने चाहिए ताकि राष्ट्रीय गान के प्रसारण में किसी भी तरह का व्यवधान ना आये, जो कि राष्ट्रीय गान का एक तरह से अपमान होगा।

2.  राष्ट्रीय गान तथा इसके किसी भी भाग को इस ढंग से प्रकाशित करना जो इसकी प्रतिष्ठा को किसी भी तरह से ठेस पहुचाये, राष्ट्रीय गान का अपमान माना जायेगा।

3.  वित्तीय लाभ के लिए राष्ट्रीय गान का किसी भी तरह से व्यावसायिक दोहन प्रतिबंधित है। राष्टीय गान का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना पूर्णतया प्रतिबंधित है जिससे  उसे किसी भी तरह का व्यावसायिक लाभ हो।

4.  राष्ट्रीय गान का किसी भी तरह का नाटकीय रूपांतरण, किसी भी तरह के शो या सेमिनार में नहीं किया जा सकता। यह इसलिए है क्योकि जब राष्ट्रीय गान बजता है तो यह हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह उसका सम्मान करे और राष्ट्रीय गान के नाटकीय रूपांतरण के बारे में सोचना पूर्णतया अकल्पनीय है।

5.  भारत के सभी सिनेमा हॉल के लिए  किसी भी फिल्म के शुरू होने से पहले राष्ट्रीय गान बजाना अनिवार्य है तथा सिनेमा हॉल में उपस्थित सभी लोगों का राष्ट्रीय गान के सम्मान में खड़ा होना भी अनिवार्य है।

 

इस तरह के निर्णयों का इतिहासः-

सर्वोच्च न्यायालय का राष्ट्रीय गान से सम्बंधित पहला निर्णय  1962 के चीन के साथ युद्ध के समय आया था। सुप्रीम कोर्ट ने तब सभी सिनेमा हॉल में राष्ट्रीय गान अनिवार्य किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट  ने यह फैसला 1975 में  वापस ले लिया था क्योंकि अधिकतम दर्शकों ने इसे नजरअंदाज कर दिया था।

हाल ही के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने कहा कि यह हर एक नागरिक का कर्तव्य है कि वह राष्ट्रीय गान का सम्मान करें। इसका उल्लेख ‘राष्ट्रीय अस्मिता के अपमान से सुरक्षा अधिनियम’-1971 (Prevention of Insults to National Honour Act) के तहत किया गया है।

राष्ट्रीय अस्मिता के अपमान से सुरक्षा अधिनियम’-1971 के अनुसार अगर कोई भी जानबुझ कर राष्ट्रीय गान के प्रसारण  में बाधा उत्पन्न करता है या ऐसी असेंबली को बाधित करता है तो  उसके लिए 3 साल के कारावास या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

महाराष्ट असेंबली ने 2003  में किसी भी फिल्म की शुरुआत में राष्ट्रीय गान के प्रसारण को  अनिवार्य किया था। 2015 में गृह मंत्रालय ने एक आदेश दिया था कि जब भी राष्ट्रीय गान प्रसारित किया जाता है तो दर्शको के लिए खड़ा होना आवश्यक है परन्तु अगर किसी फिल्म के अन्दर राष्ट्रीय गान चलता है तो दर्शको के लिए खड़ा होना आवश्यक नहीं है क्योंकि इसके प्रबंधन में दिक्कत आ सकती है जो अव्यवस्था फैला सकता है और यह राष्ट्रीय गान की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं होगा।

 

निर्णय की संवैधानिकताः-

वर्तमान निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, तथा अमित रॉय की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई याचिका के आधार पर दिया था। यह दिशा निर्देश मातृभूमि के लिए प्यार तथा सम्मान के आधार पर दिए गए हैं । कोर्ट ने यह उल्लेख किया है कि राष्ट्रीय गान तथा राष्ट्रीय ध्वज के प्रति प्यार और सम्मान देश के प्रति प्यार और सम्मान को दर्शाता है। इसके अलावा यह देशभक्ति तथा राष्ट्रवाद की भावना का भी संचार करता है।

संविधान के अनुच्छेद 51(A)(a)के तहत यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारतीय संविधान का पालन करे तथा संविधान के आदर्शो तथा संस्थाओं,राष्ट्रीय गान तथा राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करे। यह भारत के संविधान में लिखित है इसीलिए यह हर एक भारतीय का निजी कर्तव्य है।

 

कानून विशेषज्ञों के मतः-

सर्वोच्च न्यायालय के राष्ट्रीय गान से सम्बंधित निर्णय के विषय में कानून विशेषज्ञों के मिश्रित विचार हैं। कुछ कानून विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को सिनेमा हॉल में राष्ट्रीय गान के प्रसारण के समय खड़े होने पर बाध्य नहीं किया जा सकता। कुछ का यह मानना है कि किसी ‘ग्’ श्रेणी की फिल्म से पहले राष्ट्रीय गान का प्रसारण अजीब होगा।

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते है कि किसी देश के प्रति प्यार तथा सम्मान की भावना किसी भी नागरिक के अन्तःमन से आनी चाहिए ना कि किसी बाहरी स्रोत से और राष्ट्रीय गान जैसी पवित्र भावना किसी खास मौके पर ही संचालित होनी चाहिए।

कुछ विशेषज्ञों ने सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को  “न्यायतंत्र का अतिउत्सुकतावाद” कहा है, जबकि कुछ विशेषज्ञ ने ये भी माना है कि राष्ट्रीय गान के प्रसारण से किसी तरह की हानि नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय कार्यपालिका को किसी कानून में संशोधन करने का निर्देश दे सकती है परन्तु वह नागरिको को कुछ करने का निर्देश नहीं दे सकती।

यह भी एक मत रहा है कि इस निर्णय से कई तरह की अव्यवस्थायें उत्पन्न हो जाएंगी, इससे बुजुर्ग, बच्चो तथा शारीरिक रूप से विकलांग लोगो को दिक्कतें हो सकती हैं। इसके अलावा कुछ विशेषज्ञों की राय यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पहले से ही राष्ट्रीय अस्मिता के अपमान से सुरक्षा अधिनियम’-1971 में उल्लेखित है।

 

श्री मनमोहन जोशी संक्षिप्त परिचय: कानून के एक प्रसिद्ध विद्वान, , प्रेरक वक्ता, विचारक, ब्लॉगर, शिक्षाविद
श्री मनमोहन जोशी
संक्षिप्त परिचय: कानून के एक प्रसिद्ध विद्वान, , प्रेरक वक्ता, विचारक, ब्लॉगर, शिक्षाविद