मरने की आसानी – इच्छा मृत्यु  

0
525

मनमोहन जोशी :: अमेरिकी प्रान्त फ़्लोरिडा की महिला टेरी शियावो को वर्ष 1990 में दिल का दौरा पड़ा. उसका दिमाग़ तब से मौत आने तक सुन्न ही रहा. टेरी की जीवन-मृत्यु को लेकर सात साल तक क़ानूनी लड़ाई चली थी. टेरी के पति चाहते थे कि उनकी पत्नी पीड़ादायी जीवन से मुक्ति पाकर मौत की गोद में आराम करे. लेकिन टेरी के माता-पिता अपनी बेटी को जीवित रखना चाहते थे. आख़िरकार टेरी के पति को अदालत से मंज़ूरी मिल गई. इसके बाद टेरी की आहार नली को हटा लिया गया था. इस घटना के बाद “इच्छा मृत्यु” पूरी दुनिया में बहस का मुद्दा बना.

टेरी शियावो के मामले पर बहस की प्रतिध्वनि भारत में भी सुनी गई.  यहां भी कुछ ऐसे मामले सामने आए जहां मरीज़ के रिश्तेदार या स्वयं मरीज़ ने अपनी मौत की इच्छा जताई. हैदराबाद के 25 वर्षीय व्यंकटेश ने इच्छा जताई थी कि वह मृत्यु के पहले अपने सारे अंग दान करना चाहता है जिसकी मंज़ूरी अदालत ने नहीं दी. इसी प्रकार केरल हाईकोर्ट द्वारा दिसम्बर 2001 में बीके पिल्लई जो असाध्य रोग से पीड़ित था, को इच्छा-मृत्यु की अनुमति इसलिए नहीं दी गई क्योंकि भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है. बिहार पटना के निवासी तारकेश्वर सिन्हा ने 2005 में राज्यपाल के समक्ष यह याचिका लगाईं  कि उनकी पत्नी कंचनदेवी, जो सन् 2000 से बेहोश हैं, को दया मृत्यु दी जाए. जिसे अस्वीकार कर दिया गया.

भारत में इच्छा-मृत्यु और दया मृत्यु दोनों ही अवैधानिक हैं  क्योंकि मृत्यु का प्रयास, जो इच्छा के कार्यावयन के बाद ही होगा, वह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 309 के अंतर्गत अपराध है. इसी प्रकार दया मृत्यु, जो भले ही मानवीय भावना से प्रेरित हो एवं पीड़ित व्यक्ति की सहमती से उसकी  असहनीय पीड़ा को कम करने के लिए की जाना हो, वह भी भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के अंतर्गत सदोष मानववध का अपराध माना जाता है.

इच्छा-मृत्यु अर्थात यूथनेशिया (Euthanasia) मूलतः ग्रीक (यूनानी) शब्द है. जिसका अर्थ अच्छी मृत्यु होता है. यूथेनेसिया, इच्छा-मृत्यु या मर्सी किलिंग (दया मृत्यु) पर दुनियाभर में बहस जारी है. इस मुद्दे से क़ानूनी के अलावा मेडिकल और सामाजिक पहलू भी जुड़े हुए हैं. यह पेचीदा और संवेदनशील मुद्दा माना जाता है. मेडिकल साइंस में इच्छा-मृत्यु यानी किसी की मदद से आत्महत्या और सहज मृत्यु या बिना कष्ट के मरने के व्यापक अर्थ हैं. क्लिनिकल दशाओं के मुताबिक़ इसे निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है :

1.वोलंटरी (स्वैच्छिक) एक्टिव यूथेनेसिया: मरीज़ की मंज़ूरी के बाद जानबूझकर ऐसी दवाइयां देना जिससे मरीज़ की मौत हो जाए. यह केवल नीदरलैंड और बेल्जियम में वैध है।
2. इनवोलंटरी एक्टिव यूथेनेसिया: मरीज़ मानसिक तौर पर अपनी मौत की मंज़ूरी देने में असमर्थ हो तब उसे मारने के लिए इरादतन दवाइयां देना. यह पूरी दुनिया में ग़ैरक़ानूनी है.
3. पैसिव यूथेनेसिया: मरीज़ की मृत्यु के लिए इलाज बंद करना या जीवनरक्षक प्रणालियों को हटाना. इसे पूरी दुनिया में क़ानूनी माना जाता है.भारतीय उच्चतम न्यायलय ने अरुणा शानबाग वाले मामले में इसे भारत में भी वैध ठहराया.
 4. एक्टिव यूथेनेसिया: कुछ ऐसी दवाइयां मरीज़ को देना ताक़ि मरीज़ को राहत मिले लेकिन बाद में उसकी मौत हो जाए. यह तरीक़ा दुनिया के कुछ देशों में वैध माना जाता है.
5.असिस्टेड सुसाइड: पहले हुई सहमति के आधार पर डॉक्टर मरीज़ को ऐसी दवाइयां देता है जिन्हें खाकर आत्महत्या की जा सकती है. यह तरीक़ा नीदरलैंड, बेल्जियम, स्विट्ज़रलैंड और अमेरिका के ओरेगन राज्य में वैध है.

फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की एक याचिका को संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए भजा गया था. तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम की अगवाई वाली बेंच ने NGO कॉमन कॉज की याचिका पर फैसला लिया था जिसमें कहा गया था कि यदि कोई व्यक्ति मरणांतक बीमारी से पीडित हो तो उसे दिए गए मेडिकल सपोर्ट को हटाकर पीड़ा से मुक्ति दी जानी चाहिए जिसे पैसिव यूथेनेशिया कहा जाता है.

कुछ दिनों पहले ही लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ का फैसला सुना दिया है. कोर्ट ने लिविंग विल में पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत दी है. संविधान पीठ ने इसके लिए सुरक्षा उपायों के लिए गाइडलाइन जारी की है. कोर्ट ने ऐसे मामलों में भी गाइडलाइन जारी की जिनमें एडवांस में ही लिविंग विल नहीं है. इसके तहत परिवार का सदस्य या दोस्त हाईकोर्ट जा सकता है और हाईकोर्ट मेडिकल बोर्ड बनाएगा जो तय करेगा कि पैसिव यूथेनेशिया की जरूरत है या नहीं. कोर्ट ने कहा कि ये गाइडलान तब तक जारी रहेंगी जब तक कानून नहीं आता.

सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने कहा था कि राइट टू लाइफ में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार में शामिल है ये हम ये नहीं कहेंगे. हम ये कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ारहित होनी चाहिए. कुछ ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जिसमें गरिमापूर्ण  तरीके से मृत्यू हो सके. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि हम ये देखेंगे कि इच्छामृत्यु में यानी इच्छामृत्यु के लिए वसीयत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो जिसमें दो स्वतंत्र गवाह भी हों. कोर्ट इस मामले में पर्याप्त सेफगार्ड देगा. इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. गंभीर रूप से बीमार मरीज, जिसके इलाज की संभावना नहीं है. वो इच्छा मृत्यू के लिए लिख सकता है. इसके लिए गाइडलाइन जारी की गई है. गाइड लाइन की प्रमुख बातें :

  1. 1. इच्छामृत्यु के लिए वसीयत बना सकते हैं: व्यक्ति अपनी वसीयत में लिख सकता है कि लाइलाज बीमारी होने पर उसे जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए. मृत्यु दे दी जाए. विल दो गवाहों की मौजूदगी में बनेगा. इसे फर्स्टक्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रमाणित करेगा. इसकी 4 कॉपी बनेंगी. एक परिवार के पास और बाकी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट जज और नगर निगम या नगर परिषद या नगर पंचायत या ग्राम पंचायत के पास रहेगी. बीमारी लाइलाज होने पर परिजनों को अपने राज्य के हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अर्जी लगानी होगी. कोर्ट मेडिकल बोर्ड गठित करेगा. उसकी अनुमति मिलने पर कोर्ट लाइफ सपोर्टसिस्टम हटाने का आदेश देगा.
  2. 2. अगर वसीयत नहीं बना पाए हैं:- जिनके पास लिविंग विल नहीं है और उनके ठीक होने की संभावना नहीं है, तो उनके परिजन इच्छामृत्यु के लिए लिख सकते हैं. मरीज के परिजनों को राज्य के हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करना होगा. बाकी प्रक्रिया वही होगी जो लिविंग विल वाले लोगों के लिए होगी.3. दुरुपयोग रोकने के लिए शर्तें:- किसी ऐसे व्यक्ति की लाइफ विल को लेकर पूरी छानबीन होगी, जिसे संपत्ति या विरासत में लाभ होने वाला हो. यह जांच राज्य सरकार स्थानीय प्रशासन द्वारा कराएगी.

मेरे देखे जीने  के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल होना चाहिए. इसके लिए ज़रूरी नहीं कि क्यक्ति केवल किसी असाध्य शारीरिक रोग से पीड़ित हो. मेरी समझ के अनुसार कोई व्यक्ति जितना मौत के करीब होता है उतना ही उसकी जीने की इच्छा प्रबल हो जाती है. स्वयं के लिए मौत तलाशने का सम्बन्ध मन से है. कोई व्यक्ति स्वयं के लिए मौत चुनना चाहता है ये तो ठीक है लेकिन कोई यदि दुसरे के लिए मौत चुनना चाहे इसे कैसे तर्कसंगत मान सकते हैं. एक और बात, पैसिव यूथेनेशिया को मान्यता दी गई है जिसका अर्थ तकलीफ में पड़े व्यक्ति को तकलीफ से मारना है. मेरे देखे कुछ मामलों में एक्टिव यूथेनेशिया को भी मान्यता देनी चाहिए. लेकिन इसके लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की जाए. जो व्यक्ति जीवन त्याग करना चाहता है उसे सात दिनों के लिए चिकित्सकीय परिक्षण में रखा जाना चाहिए. उसकी मानसिक चिकित्सा कर उसे अपना विचार बदलने के लिए प्रेरित करना चाहिए और फिर भी वह विचार नहीं बदलता तो उसे आसन मौत दी जानी चाहिए. असाध्य रोग, शारीरिक पीड़ा या कोमा वाले मामलों में एक्टिव यूथेनेशिया ही आसन और कारगर हो सकता है. एडवांस मेडिकल साइंस का एक नुकसान भविष्य में यह भी होगा कि मांगे मुंह मौत भी नसीब नहीं होगी.  सार्थक बहस का स्वागत है.

 

 

                                  मनमोहन जोशी
                          कानूनविद , प्रख्यात लेखक
                    Connect.mmjoshi@gmail.co