महाभियोग :विपक्ष का एक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय

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Edited by- Navneet Gupta

-श्रीगोपाल गुप्ता –

कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों ने देश की सबसे बड़ी पंचायत सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस राज्यसभा के सभापति वैंकया नाइडू को सोंप दिया है! नोटिस में कांग्रेस सहित सात दलों के 71सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें से सात सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है! अतः नोटिस में वैध हस्ताक्षर संख्या 64 है जो राज्यसभा में महाभियोग के लिए जरुरी 50 से 14 ज्यादा हैं! कांग्रेस ने मुख्य न्यायाधीश को हटाने के पांच कारण गिनाये हैं और आशंका व्यक्त की है कि उनके रहते देश में लोकतंत्र खत्म हो जायेगा! इसके लिए गत 12 जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय के पांच वरिष्ठ जजों द्वारा की गई प्रेस कान्फ्रेंस को आधार बनाया है! जिसमें माननीय जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश की कार्यप्रणाली को देखते हुये देश के लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था! कांग्रेस के इस कदम से देश के राजनीतिक क्षीतिज में भूचाल आ गया है! नोटिस से सबसे ज्यादा व्यथित सत्तारुण भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इस प्रयास को न्यायपालिका के विरुद्ध करार देते हुये इसे जजों को डराने की कोशीश बताया है! वित्त मंत्री अरुण जेटली का आरोप है कि कांग्रेस महाभियोग को हथियार बना रही है! कुल मिलाकर नोटिस से हंगामा खड़ा हो गया है, सरकार और भाजपा दोनों ही दीपक मिश्रा के बचाव में जी -जान से जुट गये हैं! हालांकि माननीय मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग भ्रूण अवस्था में है और देश के हालातों से लगता नहीं है कि ये जन्म भी ले पायेगा? अभी तो केवल सभापति महोदय को नोटिस ही दिया गया है,जिसका वे परिक्षण करेंगे, लगाये गए आरोपों की गंभीरता की जांच करेंगे! जरुरी होने पर एक कमेटी बनायेंगे, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जज होंगे! कमेटी के फैसले के बाद कहीं जाकर महाभियोग राज्यसभा में आयेगा और इस पर कोई निर्णय हो सकेगा! जेटली का ये आरोप वाजिब लगता है कि सीबीआई जज की मौत पर आया सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध कांग्रेस की महाभियोग याचिका है जो जजों को डराने की कोशीश है! ये भी सच है कि कांग्रेस इस पर राजनीति कर रही है!

दरअसल 12 जनवरी को पांच जजों के प्रेस कान्फ्रेंस को जिस तरह से भाजपा ने आड़े हाथों लिया था और उन जजों को सोशल मीडिया पर जमकर लताड़ा! पूरी कोशिश की गई कि न्यायापालिका के इतिहास में 12 जनवरी के काले दिन के लिये इन जजों को खलनायक घोषित कर दिया जाये, इसके लिए बाकायदा झूठ की फैक्टरी सोशल मीडिया पर उन जजों के कनेक्शन कांग्रेस और बामपंथियों से जोड़ने के लिए बड़े-बड़े लेख परोसे गये, हद तो तब हो गई कि जब कुछ महान विद्वानों ने इनका सीधा जुड़ाव देशद्रोह के साथ करने की कोशिश की थी! जेटली और समूची भाजपा को मान लेना चाहिए कि उन तमाम कोशिशों से भी न्यायापालिका की गरिमा को काफी धक्का लगा था और वह भी विशुद्ध राजनीति ही थी! देश के लोकतंत्र की बनावट की यही खूबसूरती है कि सत्तारुण दल किसी जज पर अंगूली उठाये तो जायज और विपक्ष अगर नियमानुसार महाभियोग लाये तो लोकतंत्र को खतरा? ये दोहरे मापदण्ड नहीं चलते! इंग्लैंड में राजकीय परिषद क्यूरिया रेजिस के न्यासत्व अधिकार द्वारा ही इस महाभियोग प्रक्रिया का जन्म हुआ था, जिसे हमारे संविधान के अनुच्छेद 124(4),(5),और 217,218 में शामिल किया गया है! अतः भारतीय संविधान में महाभियोग वह प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व न्यायाधीशों को उनके पदों से हटाने के लिए होता है! यहां कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को भी संयम से काम लेना चाहिए था! बिना किसी तैयारी और तमाम बिपक्ष की सहमति के बिना उसे महाभियोग जैसा अंतिम अस्त्र का इस्तेमाल सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसला आने के बाद हड़बड़ी में नहीं करना चाहिए !हड़बड़ी का परिणाम ज्यादातर बिपरीत ही आता है! कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने ही इस महाभियोग पर ये कहते हुये प्रश्न चिण्ह खड़ा कर दिया कि चीफ जस्टिस के खिलाफ फैसला लेते समय मैं मौजुद नहीं था! उन्होने स्पष्ट कहा कि न्यायापालिका के फैसले से हर कोई सहमत नहीं हो सकता, यहां तक फैसला देने वाले जज भी आपस में क्ई दफा सहमत नहीं होते! इसलिए यह कहा जा सकता है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने का विपक्ष प्रस्ताव दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है! इस समय देश भयानक समस्याओं से जूझ रहा है, ऐसे में विपक्ष को चाहिए कि वो उसके समाधान में अपनी ऐनर्जी का सदूपयोग करे,यही उनके एवं देश हित के लिए सार्थक कदम होगा! ।