एक रहस्यमय मलाणा गांव

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मलाणा, हिमाचल राज्य की कुल्लू घाटी के उत्तर पूर्व में स्थित एक प्राचीन गांव है. यह गांव पार्वती घाटी में चंद्रखानी, देओटिब्बा पहाडियों से घिरा हुआ स्थित है

इस गांव के बारे में कई किम्वदंतियां हैं। वैसे गाँव के इतिहास से सम्बंधित कोई आधिकारिक लेख उपलब्ध नहीं हैं , परंतु दंतकथाओं के अनुसार जब सिकंदर भारत पर हमला करने आया था तो उसके कुछ सैनिक उसकी सेना छोड़ कर भाग गए थे । इन्हीं भगोड़े सैनिकों ने मलाणा गांव को बसाया था। उनके ग्रीक होने के कुछ पुष्ट प्रमाण भी हैं। लकड़ी के बने उनके अत्यन्त लेकिन कलात्मक मंदिरों में जो उकेरी हुई आकृतियां हैं, उनमें घुड़सवार सैनिक, हाथी, शराब पीते हुए सैनिक हैं, जिन्होंने फ्राकनुमा एक वस्त्र पहन रखा है। यह मूलतः उस युग के ग्रीक सैनिकों की पोशाक हुआ करती थी। साथ ही गांव वासियों के शरीर की बनावट, चेहरे-मोहरों में और गतिविधियों में स्थानीय और भारतीयता का अभाव है। इसके अलावा कई लोगों और बच्चों की आंखे नीली हैं। कहा जाता है कि इन सैनिकों ने आसपास के गांवों की लड़कियों से शादी – विवाह किये और वे भेड़ें चराकर और गेहूं की खेती करके गुजर-बसर करने लगे। शुरू-शुरू में इन भगोड़े सैनिकों ने पहचान लिए जाने के डर से अपने आपको पूरी दुनिया से अलग रखा था। बाद में यही अलगाव उनका जीवन-दर्शन बन गया।

एक किस्सा सम्राट अकबर के बारे में भी है। सुनते हैं कि किसी रोग से निजात पाने के लिए एक फकीर के कहने पर अकबर पैदल चलकर मलाना के मंदिर गया और वहां अपनी तस्वीर वाली स्वर्ण मुद्राएं चढ़ाई । बताया जाता था कि वे मुद्राएं मंदिर में सुरक्षित हैं। कहा तो यह भी जाता था कि सिकंदर के भगोड़े सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र भी एक शस्त्रागार में सुरक्षित हैं, लेकिन अभी तक किसी ने देखा नहीं।
इसके बाद भी एक बार अकबर ने ग्राम देवता ऋषि जमदग्नि की भी परीक्षा लेनी चाही । जिससे कुपित होकर देवता ने उस समय में दिल्ली में बर्फ गिरा दी । तब अकबर को दंड के रूप में देवता को स्वर्ण अश्व दान और चांदी के हिरन दान करने पड़े थे । मलाणा विश्व का इकलौता स्थान है जहाँ अकबर की हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पूजा की जाती है । आज भी गांववासी साल में एक बार अकबर की पूजा करते हैं , जिसे देखने की इजाजत किसी को नहीं होती।

सबसे आश्चर्यजनक इस गांव का प्रजातांत्रिक ढांचा है। मलाणा के लोग अपने ग्राम के प्रशासन के लिए सदस्यों का चुनाव करते हैं। एक निचली संसद और दूसरी ऊपर की संसद। निचली न्यायपालिका का नाम कनिष्टांग और ऊपरी का नाम ज्येष्टांग है। ज्येष्टांग में गयारह सदस्य हैं जिनमें तीन स्थायी और आठ अस्थायी। ये आठ चार वार्डों से जिन्हें चुग कहते हैं, चुने जाते हैं। इन सदस्यों को जेठरा कहते हैं। स्थायी सदस्यों में कार्मिष्ठ अर्थात ग्राम का मुखिया शामिल है जो मुख्य प्रशासक है। वह देवता की इच्छा से कार्य करता है। दूसरा जमलू देवता का पुजारी होता है। उसका मुख्य काम देवता की पूजा और धार्मिक रीतियों को सुचारू रूप से करवाना है। तीसरा स्थायी गुर है जिसे देवता स्वयं चुनते हैं। कभी ऐसा होता है कि देवता की ऊर्जा किसी व्यक्ति के अंदर प्रवेश कर जाती है, वह कांपता है और भविष्य वाणी करता है। उसका चुनाव गुर के रूप में हो जाता है। बाकी आठ का चुनाव होता है। निचले हाऊस को ‘कोर’ कहते हैं। हर एक निर्णय में ऊपरी न्यायपालिका और निचली न्यायपॉलिका की स्वीकृति ज़रूरी है। कभी-कभी दोनों सदनों में विचार भिन्नता होती है। इस न्यायिक तंत्र जेदांग की सहायता के लिए चार अफसर (फोगलदार) होते है। ये जमलू देवता के नाम पर कार्य करते हैं। वैसे अभी कुछ वर्षों तक मलाणा का कोई मामला कुल्लू अदालत में नहीं आता था । सभी मामले इस न्याय तंत्र और देवता द्वारा निपटाये जाते थे । पर कुछ वर्षों से स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद अब मामले अदालतों में भी जाने लगे हैं । खासकर चरस तस्करी में पकडे गए स्थानीय ग्रामीणों को कुल्लू की अदालती कारवाई से ही गुजरना पड़ता है । साथ ही जमीनी विवाद भी अब जिला न्यायालय में आने लगे हैं । फिर भी जितने भी मामले गाँव से बाहर जिला न्यायालय में जाते हैं , उनसे संबंधित लोगों को देवता को हर्जाना देना पड़ता है । परंतु जो लोग अभी भी देव निर्णय में ही मानते हैं उनके लिए देवता का अंतिम निर्णय ही सर्वमान्य होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार जमदग्नि ऋषि , विष्णु के अवतार परशुराम के पिता थे । कालांतर में निचले क्षेत्रों में पापाचार बढ़ने के कारण ऋषि के ध्यान साधना में विघ्न पड़ने लगा । इस कारण जमदग्नि ऋषि ने शिव का आव्हान किया । उन्होंने शिव से ऐसे स्थान की अभिलाषा जताई , जहाँ एकांत हो और प्रकृति अपने यौवन के रस से परिपूर्ण हो । शिव ने महृषि को हिमालय में इस स्थान पर जाकर तप साधना करने के लिए कहा । कहते हैं ऋषि ने जब इस स्थान के लिए प्रस्थान किया तो उनके दो भाइयों ने भी उनके इस हिमालय पथ का अनुसरण किया । घाटी के समीप पहुँचने पर ऋषि ने अपने भाइयों को भ्रमित करने के लिए चारों ओर कोहरे का निर्माण कर दिया । इस कारण उनका एक भाई लाहौल की ओर चला गया और दूसरा बंजार घाटी की ओर । उस समय मलाणा का सम्पूर्ण क्षेत्र बाणासुर राक्षस के अधीन आता था ।
ऋषि और बाणासुर के बीच विरोध उत्पन्न हो गया , जिसे अंततः उन्होंने एक शान्ति संधि करके विराम दिया । इस संधि के अनुसार सारे प्रशासनिक निर्णय बाणासुर के अधीन होंगे और न्यायिक निर्णय ऋषि के अधीन रहेंगे । जैसे-जैसे गाँव के रीति रिवाजों का प्रचलन शुरू हुआ कनाशी भाषा को गाँव की आधिकारिक भाषा चुन लिया गया ।
समय बीतने के साथ ऋषि ने बाणासुर पर अपना प्रभाव सुनिश्चित तो कर दिया , परंतु प्रथाओं में आज भी रक्ष प्रजाति के कलापों का प्रभाव मौजूद है । लोग देवता जमलू (जमदाग्नि) को सर्वेसर्वा मानते हैं । देवता से पूछे बिना कोई भी शुभ कार्य गाँव में नहीं किये जाते ।
मलाणा वासियों द्वारा बोली जाने वाली कणाशी बोली संस्कृत और तिब्बती भाषा का मिलाजुला अपभ्रंश रूप माना जाता है । बाहरी लोगों से इस बोली में व्यवहार करना निषेध है । एक मान्यता ये भी है कि ये राक्षसों की भाषा है । साहित्यकार भी इस बोली को वर्णित करने में अक्षम रहे हैं।