नेता विहीन हुआ जिला मुरैना

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नेता विहीन हुआ जिला मुरैना

श्रीगोपाल गुप्ता

चंबल, कुँवारी, आसन और सांक नदी के बीचों-बीच बसा मुरैना(मप्र.) कभी दस्यु समस्या के रुप में विश्व में जाना जाता था. कभी चंबल और कुँवारी के खूंखार बेहड़ों में एक से एक खतरनाक और बेखौफ डकैतों की जय ध्वनी और गोलियों की आवाज गूंजती रहती थी. मगर ये बीते दिनों की बात है. अब मुरैना के पास आर्थिक व सामाजिक समृद्धी का खजाना है. पूरे प्रदेश में कच्ची घानी सरसों के तेल के उत्पादन में अब्बल मुरैना सम्पूर्ण भारत में अपनी धाक जमा चुका है. देशी पत्थरों के मामलों में इसने देश के अच्छे -अच्छे और ख्याति प्राप्त शहरों को पीछे छोड़ दिया है.आर्थिक सपन्नता से लबालब होने के बावजूद राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण आज मुरैना नेता विहीन हो चुका है, जो इसका बहुत दुःखद और गंभीर पहलु है. जिसकी कीमत लाखों की जनसंख्या वाले मुरैना ने गत 2 अप्रैल से लेकर 10 अप्रैल तक चुकाई और अभी भी चुका रहा है एवं भविष्य में भी चुकाता रहेगा?एक समय था, जब शहर की फिंजा में जरा सा भी जहर घोलने की कोशिश आतातायियों द्वारा की जाती थी तो आम शहरी अपने घरों से निकल भी नहीं पाते थे कि हमारे नेता मोर्चे पर डटे दिखते थे. किसी भी दल या पार्टी के होते थे, मगर हम मुरैना के नागरीकों के लिये अपनेपन और विश्वास की डौर हुआ करते नेता. जैसे-जैसे मुरैना समृर्दी की और बढ़ता गया, वैसे-वैसे हमारे अपने नेताओं का परलोक गमन चलता रहा. परिणाम देश के सामने है, एससी-एसटी के एक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी एक आदेश की आग ने गत 2 अप्रैल को मुरैना को अपने आगोश में ले लिया. मुरैना के लोग और सीमित संशाधनों के साथ पुलिस, प्रशासन बदहाली के आलम में बहदवास की हालत में जलते हुये मुरैना की आग बुझाने के लिए भागते-दौड़ते रहे ,मगर नेता विहीन मुरैना का एक भी नेता उपद्रवियों से शांति की अपील करने और उन्हें हिंसा के प्रति समझाने के लिए नहीं सामने नहीं आया. कहने को तो मुरैना का अपना सांसद है ,विधायक और महापौर भी हैं साथ में पार्षदों की लंबी फौज भी है. ऐसा नहीं है कि मुरैना के पास विपक्षी दलों के नेताओं की कोई कमी है?लगभग दर्जन भर से ज्यादा पार्टियों के नेताओं की लंबी फेहरिस्त है, बावजूद कोई नेता सड़क पर अवाम को राहत दिलाने के लिये नहीं आया जो इस लावारिस शहर का दुर्भाग्य है.ये घटना बताती है कि चुनाव में बाहरी नेताओं पर दांव आजमाने वाले दल भूल जाते हैं कि इस शहर की भी अपनी हस्ती है,जो कभी अपने नेताओं से भरपूर थी.

चंबल की धरा पर मौजूद मुरैना आज इस संकट में डूंढ़ रहा है अपने उस लाल, जनसंघ के निर्माता और मूर्तधन्य भारतीय जनता पार्टी के अजातशत्रु कुँ जाहर सिंह शर्मा को, जिसने सन् 1964 में तात्कालीन क्लेक्टर रेनवो के जुल्म से आम शहरी को बचाने के लिए भरी दोपहरी में सख्त कर्फ्यू को तोड़ते हुये रेनवो को अपनी छाती दिखाते हुए गोली मारने की चुनौती दी थी. जनता में से किसी को जरा सी खरोंच आने पर संघर्ष करने के लिए बनने वाली संघर्ष समिति के परमानेंट आजीवन अध्यक्ष सोसलिष्ट पार्टी के दिग्गज और ख्यातिनाम एडवोकेट स्वर्गीय पण्डित छोटेलाल भारद्वाज कहां हैं ?जिनकी एक हूंकार पर प्रशासन और जनता एक साथ अपनेपन से खड़े हो जाते थे.चंबल खोज रही है अपने कोहिनूर बाबू जबरसिंह को जिनका नारा ही “भाईचारा “था. शहर वाट जो रहा है अपने उस नेता की, जो एक दल के तखरीबन 30 साल मुखिया होने के बावजूद सभी दलों के लिए लड़ने और जनता की आवाज बुलंद करने वाले ठाकूर हरीराम सिंह सर्राफ को, जिनके आने के साथ ही बड़े-बड़े जातीय विद्वेष समाप्त हो जाते थे. छूटों के बीच लगे 2अप्रैल से 10 अप्रैल तक कर्फ्यू की आग में जले शहर के लोग अपने भाई सोवरन सिंह मावई की राह देखते रह गये. मगर उस परलोक में जाने वाले आखिर वापस भी तो नहीं आते.और भी न जाने कितने महान शहर के नेता,जिन्होने कभी अपने दर्द को दर्द नहीं माना, मगर जनता की तकलीफों को दूर करने में अपनी जान की बाजी तक लगा देते थे . मगर इन आठ दिनों में जब लोग अपने-अपने छोटे बच्चों के साथ घर में कैद होकर इंतजार ही करता रहा, मगर कोई नेता जलते हुये मुरैना में पानी की बौछार करने तक जनता के बीच या सामने तक नहीं आया. शहर की आवो-हवा में चेन की कोशिशों के लिए जो भी किया प्रशासन और पुलिस ने ही किया. प्रशासन और पुलिस की कार्यवाही पर आम जनता या बुद्धजीवियों में मतभेद हो सकता है कि उसने अच्छा किया या बुरा किया? मगर सच यह है कि उसने किया. अब ऐसा करना चाहें उसका कर्तव्य रहा हो या मानवीय संवेदना !क्योंकि हमारा अपना शहर हमारा तो मुरैना नेता विहीन हो चुका है!