चित्त भी मेरी, पट्ट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का ..

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Edited by- Navneet Gupta

– श्रीगोपाल गुप्ता –

” चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का ” , ये एक विशुद्ध भारतीय कहावत है जो कर्नाटक में पिछले 72 घंटे से चल रहे हाई वोल्टेज ड्रामा पर 100 फीसदी खरी उतरती है! जिस तरह संविधान को ताक पर रख कर राज्यपाल वजुभाई वाला ने अपने कथित विशेषाधिकार का हवाला देकर भाजपा विधायक दल के नेता डा. बुकानाकेरे सिद्धलिंगप्पा येददयुरप्पा को राज्य के 32 वें मुख्यमंत्री मनोनीत किया, उससे यह कहावत आज भी सच होती प्रतीत होती है! यह सच है कि गत 12 मई को सपन्न हुये विधानसभा चुनाव में 104 सीट पाकर भाजपा सबसे बड़े दल के रुप में उभरी है मगर वो जरुरी बहुमत 112 से आठ सीट कम है! जबकी भाजपा की इस बड़ी उपलब्धि से घबराई कांग्रेस 78 ने तत्काल भाजपा को रोकने के लिए जेडीएस 38 को अपना बहुमत देकर कुमार स्वामी को नया मुख्यमंत्री बनाने की कबायद कर दी! इस प्रकार कांग्रेस और जेडीएस विधायकों की संख्या आवश्यक 112 से चार ज्यादा है! मगर भाजपा विचारधारा के हमसफर महामहीम राज्यपाल वजुभाई वाला को मजबूत और टिकाऊ सरकार के रुप में बिना पूर्ण बहुमत वाले येददुरप्पा रास आये और 16 मई की देर रात्री में उन्होने येददुरप्पा साहेब का मुख्यमंत्री बनने का दावा स्वीकार करते उन्हें अगले दिन 17 मई को ही सुबह-सुबह नौ बजे पद व गोपनियता की शपथ दिलवा दी! ये जल्दबाजी राज्यपाल भवन द्वारा इसलिए भी दिखाई गई थी, क्योंकि इस मसले को कांग्रेस 16 मई की रात को ही सर्वोच्च न्यायालय में ले गई !इतना ही नहीं महामहीम राज्यपाल महोदय ने सह्रदयता दिखाते हुए अपनी तरफ से येददुरप्पा साहब को बहुमत सिद्ध करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया जबकि येददुरप्पा केवल पांच से सात दिन का समय मांग रहे थे! ऐसा करकर राज्यपाल वजुभाई ने अंटा वाली कहावत को पुनः सच साबित कर दिया! ऐसी सहृदयता दिखा कर स्पस्ट कर दिया कि फैसले अपनी सुविधा के अनुसार लिए जाते हैं ,जो संवेधानिक संस्थाओं की गरिमा पर सवालिया चिन्ह भी लगाते हैं।जबकि होना वो चाहिए जो इसी एक साल में गोवा, मणीपुर और मेघालय विधानसभा चुनाव में हुआ! वेशक इन तीनों राज्यों में कांग्रेस बड़े दल के रुप में उभरी मगर राज्यपालों ने बड़े दल को प्राथमिकता न देते हुए भाजपा द्वारा चुनाव बाद बनाये गये गठबंधनों को ही सत्ता की चाबी सौंपी! हद तो यह हुई की मेघालय की 60 सदस्यी सदन में कांग्रेस को 21 सीट मिली और भाजपा को मात्र 2 सीट, मगर भारत के भाग्य विधाता बने माननीय राज्यपाल महोदय ने भाजपा नीत एनडीए की सरकार बनबा दी! प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक स्व. श्री आलोक तोमर कहा करते थे कि ये ठीक है कि पत्रकार बिकता है, मगर ये तो देखो कि उसको खरीद कोन रहा है? असली देशद्रोही तो वो है जो उसको खरीद रहा है! कर्नाटक में भी राज्यपाल महोदय को बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने संज्ञान में लेकर यह सोचना चाहिए कि मात्र 24 घंटो में ही जनता की कृपा से जीतकर आये अन्य दलों के आठ विधायक जो बिकने के लिए तैयार हैं, मगर इनको खरीद कोन रहा है? चूंकि किसी अन्य दल से चुनकर आये ये विधायक तो निष्कृष्ट हैं ही, मगर इनका खरीददार कोन है, ये दल उनसे बड़ा निष्कृष्ट है और उसी को सत्ता की कमान! निश्चित ही उनको जो कहते थे कि न खाऊंगा और न खाने दूंगा, को भी जबाव देना पड़ेगा की कर्नाटक में सत्ता में बने रहने के लिए आठ विधायकों को तोड़कर अपने साथ मिलाना होगा,इसमें दल-बदल कानून आड़े हाथों आ सकता है ! इस कानून से बचने के लिए विरोधी दलों के कम से कम 14 विधायकों से स्तिफा दिलाकर 104 सीटों पर ही बहुमत साबित करने के लिए विधायकों को मोटी रकम देकर तैयार कराया जायेगा!ये पूरा काम धर्मार्थ खाते होना संभव नहीं है, क्योंकि साथ देने वाले विधायक साधू तो नहीं हैं, हैं तो वे बहुत घुटे हुये नेता ही! देश के वर्तमान भाजपाई हुक्मरानों को इस पर भी विचार करना चाहिए कि कर्नाटक पर बलात कब्जा कर लेने से उनकी विस्तार की भूख की उदर पूर्ति तो हो जायेगी मगर उनके बुद्धिजीवी समर्थकों में नाराजगी उत्पन्न होना भी स्वाभाविक है!इसका खामियाजा भी उन्हें कभी न कभी जैसे आज कांग्रेस चुका रही है वैसे ही चुकाना होगा! जिसकी शुरुआत सूक्षम रुप से माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से हो भी चुकी है कि जब भाजपा पर बहुमत है तो साबित करने के लिए 15 दिन क्यों? शनिवार 19 मई शाम चार बजे क्यों नहीं! अब शाम चार बजे क्या होगा ये तो भविष्य के गर्भ में है फिलाहल तानाशाह हुक्मरानों और कर्नाटक के महामहीम राज्यपाल के लिए ये दो लाइन हाजिर हैं – “बलंदियां कब कहां, किसी के हिस्से में रहती हैं, ऊंची इमारतें तो हमैशा खतरों के साये में होती हैं!”