क्या मप्र में कांग्रेस का वनवास समाप्त होगा?

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क्या मप्र में कांग्रेस का वनवास समाप्त होगा

श्रीगोपाल गुप्ता

पहले मंदसौर और अब भोपाल में सफल और भारी भीड़ भरे राहुल गांधी के सफल रोड शो और आमसभा से प्रदेश कांग्रेस गदगद तो है मगर अधूरे लाव-लश्कर के साथ कांग्रेस प्रदेश का किला फतह कर लेगी? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि कांग्रेस ने जब से प्रदेश की बागडोर अनुभवी पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को सौंपी है, तब से पार्टी ने करवट तो ले ली है। मगर बावजूद इसके कांग्रेस के लिये “अभी दिल्ली दूर है”वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। क्योंकि पिछले पन्द्रह वर्ष में हार दर हार से कांग्रेस का ढांचा बुरी तरह से चरमरा गया है। कमलनाथ और पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की भारी कोशिशों और मेहनत के बाद भी कांग्रेस की सेहत में वो सुधार नहीं हो पाया है जिसकी जरुरत है। प्रदेश में एक तरफ जहां मुख्यमंत्री के चेहरे की मांग लंबे समय से कार्यकर्ताओं द्वारा जारी है वहीं सारे प्रयासों के बाद भी कांग्रेस गुटबाजी से मुक्त नहीं हो पा रही है। परिणाम स्वरुप तहसील से लेकर बड़े-बड़े शहरों में कार्यकर्ता और नेता गुटबाजी के शिकार हैं। पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस का बूथ मैनेजमेंट भी केवल कागजों तक ही सीमित रह गया है। प्रदेश नेतृत्व द्वारा बार-बार किये जा रहे दावों के बावजूद कांग्रेस अपने प्रत्याशियों की सूची घोषित करने में अभी नाकामयाब रही है। और सही मायने में कांग्रेस की हार का यही वो महत्वपूर्ण कारण है जो चुनाव के युद्ध में उसकी हार की मुख्य वजह बनता है। चूंकि भाजपा में सांगठनिक क्षमतायें कांग्रेस के मुकाबले बहुत बेहतर है।वहां चुनाव उम्मीदवार से ज्यादा संगठन लड़ता है जबकि कांग्रेस में चुनाव संगठन कम उम्मीदवार ज्यादा लड़ता है। यही वो कारण है कि कांग्रेस में टिकट मिलने के बाद बूथ से लेकर आमसभा और खर्च से लेकर मतदाता मेल-मुलाकात का सारा कुछ उम्मीदवार को ही करना पढ़ता है।चूंकि पिछले तीन चुनाव में देखा गया है कि कांग्रेस अपने उम्मीदवार का फैसला अंतिम समय में जब चुनाव आयोग द्वारा नामांकन फार्म जमा कराने की अंतिम तिथी होती है तब करती है। ऐसे में मात्र 14-15 दिनों का समय उम्मीदवार को मिलता है। इतने कम समय में तो कांग्रेस उम्मीदवार अपने रुठे और गुटबाजी में फंसे अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को मनाने में ही बिता देता है और मतदाता तक पंहुच ही नहीं पाता। इसी स्थिति को भांपते हुये ही प्रदेश कांग्रेस ने इस दफा अपने उम्मीदवारों की घोषणा चुनाव से दो महिने पहले करने की घोषणा की थी मगर वे इसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं। चूंकि पांच अक्टूबर से आचार संहिता लगने की संभावना है और राहुल गांधी का भोपाल दौरा भी हो गया है अतः कांग्रेस को चाहिये कि शिघ्र ही अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर जनता के बीच भेजने का काम करे। इधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भोपाल में पैराशूट नेताओं को टिकट न देने की बात कहकर कमलनाथ की मुस्किलें बढ़ा दी हैं। कमलनाथ ने भाजपा के हथियार से भाजपा पर हमला करने की रणनीति बनाई थी। कमलनाथ के अनुसार करीब 30 भाजपा के विधायक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए उनके सम्पर्क हैं। अब तक ये काम भाजपा कर रही थी कि कांग्रेस के सांसद और विधायकों को बड़ी संख्या में भाजपा से टिकट दे रही थी। हालांकि कमलनाथ काफी अनूभवी और तजुर्बेदार हैं अपनी इस रणनीति से कांग्रेस अध्यक्ष को आने वाले समय राजी कर लेंगे। क्योंकि यह कांग्रेस के स्वास्थ्य और भाजपा को ध्वस्त करने में मददगार होगा।मगर कांग्रेस को भाजपा से डटकर मुकाबला करना है तो बिना कोई देरी किये अपने उम्मीदवार घोषित करने चाहिये।